नई दिल्ली,11 मई (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने चलती ट्रेन में लॉ कॉलेज की एक स्टूडेंट के साथ यौन उत्पीडऩ के आरोपी तमिलनाडु के एक निलंबित पुलिस अधिकारी को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी. यह आदेश 7 मई को जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस वी एन भट्टी की पीठ ने पारित किया था.
पीडि़ता छात्रा ने मद्रास हाई कोर्ट के 7 जनवरी, 2026 के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी. हाई कोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 1, शेख अब्दुल्ला मोहम्मद को अग्रिम जमानत दे दी थी.
यह केस भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 62, 75 और 304(2) के साथ तमिलनाडु महिला उत्पीडऩ निषेध अधिनियम, 2002 की धारा 4 के तहत रजिस्टर किया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, हाई कोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 1 को अग्रिम जमानत दी है, सिर्फ इसलिए कि प्रतिवादी नंबर 1, जो पुलिस सर्विस में है, उसे तुरंत सेवा से निलंबित कर दिया गया था और हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं होगी.
पीठ ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि विभागीय कार्रवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, आरोपी को गिरफ्तारी से बचाने का हाई कोर्ट का फैसला कानून की नजर में टिकने लायक नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जिस तरह से आदेश पास किया गया है और यह तर्क कि प्रतिवादी नंबर 1 को निलंबित कर दिया गया है और इसलिए उसे जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए, हमें पसंद नहीं आया.
सुप्रीम कोर्ट ने लॉ स्टूडेंट की अपील मान ली, जिसका केस एडवोकेट विशाल सिन्हा ने लड़ा.
पीठ ने कहा, ऊपर बताए गए तथ्यों और हालात को देखते हुए, हम 7 जनवरी 2026 के विवादित आदेश को रद्द करते हैं और मामले को हाई कोर्ट को वापस भेजते हैं ताकि प्रतिवादी नंबर 1 की अग्रिम जमानत पर योग्यता के आधार पर, कानून के मुताबिक जल्द से जल्द नए सिरे से विचार किया जा सके. इसलिए, अपील मंजूर की जाती है. दोनों पक्षों के लिए यह खुला होगा कि वे कानून के हिसाब से जो भी दलीलें मौजूद हैं, उन्हें उठा सकते हैं.
यह घटना पिछले साल दिसंबर के आखिर में हुई जब लॉ की स्टूडेंट ट्रेन में अकेली सफर कर रही थी. कहा जाता है कि पुलिसवाला चेन्नई में ड्यूटी के बाद लौट रहा था, जब ट्रेन कटपडी के पास पहुंची तो उसने महिला को गलत तरीके से छुआ और परेशान किया. छात्रा ने इस गलत हरकत को अपने मोबाइल फोन पर रिकॉर्ड कर लिया और रेलवे पुलिस को बताया.
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