आज सोमवार को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में होगा ‘पीपल्स पद्मÓ का महासंगम; राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू करेंगी वनांचल के वास्तविक नायकों का सम्मान
डॉ. बुधरी ताती का ‘बड़ी दीदीÓ बनकर सुदूर गाँवों तक पहुँचना और गोडबोले दंपत्ति का आदिवासी समाज के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए वर्षों तक किया गया निस्वार्थ कार्य आज की युवा पीढ़ी के लिए एक जीवंत प्रेरणा है। कल जब राष्ट्रपति भवन की भव्य दीवारें इन महान विभूतियों के योगदान की गूंज से गुंजायमान होंगी, तब पूरा छत्तीसगढ़ और देश गर्व से मुस्कुराएगा। यह ‘पीपल्स पद्मÓ इस सत्य का उद्घोष है कि भारत अपने उन सपूतों को कभी नहीं भूलता, जो निस्वार्थ भाव से राष्ट्र की नींव को मजबूत करने में अपना जीवन समर्पित कर देते हैं।
पत्र सूचना कार्यालय द्वारा जारी
भारतीय गणराज्य की गौरवशाली परंपरा में आज (सोमवार) एक और ऐतिहासिक अध्याय जुडऩे जा रहा है। देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में आयोजित भव्य नागरिक अलंकरण समारोह में भारत की माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू देश के उन अनमोल रत्नों को ‘पद्म पुरस्कारÓ से अलंकृत करेंगी, जिन्होंने बिना किसी प्रचार-प्रसार की इच्छा के समाज के अंतिम छोर पर खड़े लोगों के जीवन को बदलने में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
हाल के वर्षों में देश ने पद्म पुरस्कारों के स्वरूप को बदलते और इन्हें वास्तव में ‘पीपल्स पद्मÓ (जनता का पद्म) बनते देखा है। पहले जहाँ ये सम्मान महानगरों की चकाचौंध, रसूखदारों और सत्ता के गलियारों तक सीमित माने जाते थे, वहीं अब ये पुरस्कार सुदूर जंगलों, दुर्गम पहाड़ों, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और जनजातीय बस्तियों के उन साधकों तक पहुँच रहे हैं, जिन्होंने कभी किसी सम्मान की कामना ही नहीं की।
इसी कड़ी में कल का दिन विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के जनजातीय समाज के लिए गौरव का अवसर बनने जा रहा है। बस्तर संभाग के सुदूर, दुर्गम और नक्सल प्रभावित वनांचलों में स्वास्थ्य सेवा, कुपोषण के खिलाफ संघर्ष, बालिका शिक्षा, नशामुक्ति और महिला सशक्तीकरण की अलख जगाने वाले छत्तीसगढ़ के तीन महान समाजसेवियों—डॉ. बुधरी ताती (‘बड़ी दीदीÓ) तथा प्रख्यात समाजसेवी दंपत्ति डॉ. रामचंद्र गोडबोले और श्रीमती सुनीता गोडबोले—को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म श्रीÓ से सम्मानित किया जाएगा। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्यों इन विभूतियों का सम्मान पूरे राष्ट्र और मानवता के लिए गौरव का विषय है।
डॉ. बुधरी ताती (‘बड़ी दीदीÓ): 500 गाँवों तक पैदल पहुँचकर सामाजिक परिवर्तन की अलख जगाने वाली महानायिका
छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर स्थित दंतेवाड़ा जिले के हीरानार गाँव की रहने वाली डॉ. बुधरी ताती को बस्तर अंचल का जनजातीय समाज अत्यंत सम्मान और स्नेह के साथ ‘बड़ी दीदीÓ कहकर पुकारता है। पिछले चार दशकों से अधिक समय से वे सुदूर वनांचलों में वनवासी कल्याण, बालिका शिक्षा और महिला सशक्तीकरण के लिए अपना जीवन समर्पित किए हुए हैं। इसी मूक साधना और समाजसेवा के लिए उन्हें ‘पद्म श्रीÓ से सम्मानित किया जा रहा है।
जब रास्ते नहीं थे, तब बनीं सहारा
डॉ. बुधरी ताती की सेवा यात्रा वर्ष 1984 में शुरू हुई थी, जब बस्तर के घने जंगलों में न सड़कें थीं, न मोबाइल नेटवर्क और न ही बुनियादी सुविधाएँ। उस दौर में आदिवासी समाज के बीच जाकर उनका विश्वास जीतना किसी चुनौती से कम नहीं था।
‘बड़ी दीदीÓ ने अबूझमाड़ और दंतेवाड़ा के नक्सल प्रभावित घने जंगलों के बीच सैकड़ों गाँवों की पैदल यात्राएँ कीं। उस समय वनवासी परिवार पूरी तरह वनोपज और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर थे, जिसके कारण बच्चों की शिक्षा उपेक्षित रह जाती थी। बुधरी ताती ने माता-पिता को धैर्यपूर्वक समझाया कि शिक्षा ही उनके बच्चों के भविष्य को बदल सकती है और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ सकती है।
महिला सशक्तीकरण की नई इबारत
‘बड़ी दीदीÓ ने केवल बच्चों को स्कूल भेजने तक अपना कार्य सीमित नहीं रखा, बल्कि आदिवासी महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किए।
उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं के लिए सिलाई-कढ़ाई एवं हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किए।
उनके प्रयासों से अनेक आदिवासी महिलाएँ आत्मनिर्भर बनकर अपने पैरों पर खड़ी हुईं।
उनकी प्रेरणा से कई आदिवासी बेटियाँ आज विभिन्न अस्पतालों में नर्स के रूप में कार्यरत हैं।
कुपोषण और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान
मारिया और मुरिया जनजातीय समुदायों के बीच कार्य करते हुए उन्होंने देखा कि जागरूकता के अभाव में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर अत्यधिक थी। डॉ. बुधरी ताती ने पारंपरिक जनजातीय ज्ञान और आधुनिक स्वास्थ्य पद्धतियों के समन्वय से स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने का कार्य किया।
इसके साथ ही उन्होंने शराबखोरी, घरेलू हिंसा और अंधविश्वास जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी व्यापक अभियान चलाया। सीमित संसाधनों से शुरू हुआ उनका यह प्रयास आज बस्तर के सामाजिक परिवर्तन की मिसाल बन चुका है।
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