पंकज दुबे
फि़ल्म पत्रकार-लेखक हुसैन ज़ैदी की किताब ‘द माफिय़ा क्वींस ऑफ़ मुंबई’ से प्रेरित है, जिसका स्क्रीनप्ले ख़ुद विशाल भारद्वाज ने लिखा है। ज़ैदी की लेखनी जहां अपराध जगत की स्त्रियों की जटिल दुनिया को दस्तावेज़ी सटीकता के साथ खोलती है।
आज के ‘सिने-सोहबतÓ में विशाल भारद्वाज की फि़ल्म ‘ओÓ रोमियोÓ पर विमर्श करते हैं। विशाल भारद्वाज जब भी सिनेमा बनाते हैं, वे कहानी नहीं, एक वातावरण रचते हैं। उनकी फि़ल्मों में हवा तक का रंग होता है और उस रंग में धूल, खून, प्रेम और पछतावे की परतें तैरती रहती हैं। ‘ओÓ रोमियोÓ इसी परंपरा का विस्तार है। एक ऐसी फि़ल्म जो माफिय़ा की दुनिया को महज़ अपराध की कथा नहीं, बल्कि मनुष्यता की विडंबना के रूप में देखती है।
यह फि़ल्म पत्रकार-लेखक हुसैन ज़ैदी की किताब ‘द माफिय़ा क्वींस ऑफ़ मुंबईÓ से प्रेरित है, जिसका स्क्रीनप्ले ख़ुद विशाल भारद्वाज ने लिखा है। ज़ैदी की लेखनी जहां अपराध जगत की स्त्रियों की जटिल दुनिया को दस्तावेज़ी सटीकता के साथ खोलती है, वहीं विशाल भारद्वाज उसे सिनेमाई काव्य में रूपांतरित करते हैं। परिणामस्वरूप हमें एक ऐसा टेक्सचर मिलता है, जिसमें यथार्थ और रूपक एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।
सबसे पहले बात करते हैं फि़ल्म ‘ओÓ रोमियोÓ की कहानी की। फि़ल्म का केंद्र है, उस्तुरा, जिस किरदार को शाहिद कपूर ने बारीकियों से निभाया है। उस्तुरा एक सुपारी किलर है, जिसकी आंखों में स्थिरता है और चाल में एक अजीब-सी ठंडक। वह पेशे से कातिल है, लेकिन उसके भीतर एक घायल कवि भी छिपा है।
कहानी का सूत्रपात तब होता है जब एक स्त्री उसके पास आती है, जिसका मक़सद है अपने पति की हत्या का बदला लेना। उसका पति गैंग में अकाउंटेंट था और अब आगे लम्बे समय तक गैंग में शामिल होने से मना कर देता है और मारा जाता है। वह चाहती है कि उस्तुरा उन सभी लोगों का सफ़ाया कर दे, जिन्होंने मिलकर नायिका के पति को मार डाला। यहीं से ‘ओÓ रोमियोÓ एक रिवेंज ड्रामा की शक्ल लेती है लेकिन यहीं वो पॉइंट है जो इस फि़ल्म की पहली समस्या भी है- ‘इमोशनल डिस्कनेक्टÓ।
नायिका (तृप्ति डिमरी) के विवाह, उसके प्रेम और उसके पति की हत्या का जो भावनात्मक परिप्रेक्ष्य होना चाहिए था, वह घोर अपर्याप्त है। दर्शक उसके दर्द से जुड़ नहीं पाते क्योंकि पटकथा उसे पर्याप्त स्क्रीन-टाइम नहीं देती। उसकी त्रासदी का ताप दर्शकों तक पूरी तरह संप्रेषित हो ही नहीं नहीं पाता।
यहां विशाल भारद्वाज की पोएट्री कहीं-कहीं पटकथा की कसावट पर भारी पड़ती दिखती है।
शाहिद का उस्तुरा एक सधे हुए अभिनेता की परिपक्वता का उदाहरण है। उनके संवाद कम हैं, पर आंखों का संवाद मुखर है। वे अपने शरीर की भाषा से किरदार को जीवित करते हैं। हिंसा के दृश्यों में वे अतिरेक से बचते हैं और यही संयम उनके अभिनय को प्रभावी बनाता है।
नायिका (तृप्ति डिमरी) की भूमिका संभावनाशील थी, परंतु लेखन की कमी ने उसे सीमित कर दिया। उसके चरित्र में प्रतिशोध की ज्वाला है, पर उस ज्वाला की पृष्ठभूमि अधूरी है। स्पेन में बैठा खलनायक, जिसे अविनाश तिवारी ने निभाया है, अपने ‘बुल फाइटÓ के शौक में अधिक दिखता है, पर उसके भीतर की वैचारिक या भावनात्मक प्रेरणा स्पष्ट नहीं होती। उसका मोटिव धुंधला है। वह क्यों इतना क्रूर है? उसकी महत्वाकांक्षा क्या है? उसकी निजी हानि या महत्वाकांक्षा का आयाम क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर फि़ल्म नहीं देती। परिणामस्वरूप वह एक प्रभावशाली दृश्य उपस्थिति तो बनता है, पर स्मरणीय खलनायक नहीं। एक वक़्त के बाद वह डरावना विलेन नहीं, बल्कि एक ड्रामा करता कैरीकेचर ही लगता है।
बाक़ी कलाकारों में नाना पाटेकर, तमन्ना भाटिया के साधे हुए काम के साथ साथ अरुणा ईरानी और फऱीदा जलाल को भी काफ़ी समय के बाद बड़े परदे पर देखने का मौक़ा मिलता है।
विशाल भारद्वाज की सभी फिल्मों में संगीत तो शानदार होता ही है। इसमें भी संगीत विशाल का ही है और गीत लिखे हैं गुलज़ार ने। इन दोनों की कॉम्बिनेशन हमेशा ही डेडली रहती है। इस फि़ल्म में भी धुनों में छिपी दास्तान रह रह कर कंफ्यूज करती है कि कहीं हम फि़ल्म को नकार देने में जल्दबाज़ी तो नहीं कर रहे। यहां भी बैकग्रॉउंड म्यूजि़क में सूफिय़ाना तान और पश्चिमी गिटार का संगम है। गीतों में एक गज़़लनुमा उदासी है, जो माफिय़ा की दुनिया के भीतर भी प्रेम की संभावना को जीवित रखती है। कुछ गीत कहानी को आगे बढ़ाते हैं, पर कुछ स्थानों पर गति को बाधित भी करते हैं। एडिटिंग की दृष्टि से कुछ ट्रैक्स को बहुत आसानी से छोटा किया जा सकता था।
फि़ल्म का विज़ुअल पैलेट गहरा है। मटमैले रंग, बारिश से भीगी गलियां, और समुद्र के किनारे की वीरानी। मुंबई यहां सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक पात्र है। कैमरा अक्सर स्थिर रहता है, जैसे अपराध के शोर के बीच भी कोई मौन साक्षी हो।
स्पेन के दृश्य, विशेषकर बुल फाइट एक रूपक की तरह इस्तेमाल किए गए हैं। मनुष्य और पशु की लड़ाई यहां सत्ता और वर्चस्व की प्रतीक बनती है। परंतु, यह रूपक जितना सुंदर दिखता है, उतना ही भावनात्मक स्तर पर अलग-थलग भी प्रतीत होता है। खलनायक का स्पेन में व्यस्त रहना कहानी की मुख्य धारा से उसे काट देता है।
विशाल भारद्वाज का निर्देशन हमेशा की तरह सधा हुआ है। वे हिंसा को ग्लैमराइज़ नहीं करते, बल्कि उसे एक नैतिक प्रश्न की तरह प्रस्तुत करते हैं। कैमरे की गति, फ्रेम की रचना और प्रकाश का प्रयोग उन्हें समकालीन निर्देशकों से अलग करता है।
परंतु, इस बार उनकी शेक्सपीरियन प्रवृत्ति कहीं-कहीं कथा की ठोस ज़मीन से दूर ले जाती है। फि़ल्म का शीर्षक ‘ओ ‘रोमियोÓ अपने भीतर प्रेम और त्रासदी का संकेत देता है, पर प्रेम की वह गहराई परदे पर पूरी तरह साकार नहीं हो पाती।
‘ओÓ रोमियोÓ की पटकथा में कई चमकते क्षण हैं। इसके संवादों में साहित्यिकता है, दृश्य-रचना में प्रतीकात्मकता है लेकिन इमोशंस के डिपार्टमेंट में यह फि़ल्म सभी तामझाम के बावजूद चूक जाती है।
चूंकि फि़ल्म का स्रोत ‘द माफिय़ा क्वींस ऑफ़ मुंबईÓ है, इसलिए अपेक्षा थी कि स्त्री के दृष्टिकोण को अधिक गहराई से उभारा जाएगा। फिल्म उस दिशा में जाती तो है, पर पूर्णता तक नहीं पहुंचती।
फि़ल्म यह प्रश्न उठाती है कि क्या अपराध की दुनिया में भी प्रेम संभव है? क्या प्रतिशोध ही मुक्ति है? क्या हिंसा के चक्र से बाहर निकलने का कोई रास्ता है?
‘ओÓ रोमियोÓ एक सुंदर, सघन और महत्वाकांक्षी फि़ल्म है। यह मनोरंजन से अधिक एक अनुभव है। शाहिद कपूर का प्रदर्शन लंबे समय तक याद रहेगा। विशाल भारद्वाज की सौंदर्य दृष्टि एक बार फिर सिद्ध करती है कि वे भारतीय सिनेमा के सबसे विशिष्ट फिल्मकारों में से एक हैं। परंतु, यह फि़ल्म महान होने से कुछ कदम दूर रह जाती है। मुख्यत: भावनात्मक निवेश की कमी और खलनायक की अस्पष्टता के कारण।
फिर भी, इस फि़ल्म को इसलिए भी देखना ज़रूरी है क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि अपराध की दुनिया में भी कविता छिपी हो सकती है, और प्रेम कभी-कभी उस्तुरे की धार पर भी खिल सकता है। यह ऐसा सिनेमा है जो चोट भी करता है और सोचने पर मजबूर भी।
नज़दीकी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा।
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