जो देश अपनी युवा श्रमशक्ति का पूरा उपयोग नहीं कर पाते, उनके संबंध में आम समझ है कि वे धनी होने से पहले बूढ़ा हो जाते हैं। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत पर डेमोग्रैफिक डिविडेंड गंवा देने का खतरा मंडरा रहा है।
युवा आबादी के संभावित लाभ को भारत गंवाने जा रहा है- यह निष्कर्ष है अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के ‘भारत में कामकाज की स्थिति-2026Ó रिपोर्ट का। इसके मुताबिक 2030 में युवा आबादी (15- 29 वर्ष) अपनी चरम संख्या पर पहुंच जाएगी। उसके बाद इसमें गिरावट आने लगेगी। फिलहाल 36.7 करोड़ युवा इस उम्र वर्ग में हैं, जो कुल कामकाजी उम्र की आबादी का एक तिहाई हिस्सा है। मगर उनमें से 26.3 करोड़ ना शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, ना रोजगार में हैं। अत: उनके श्रमशक्ति का हिस्सा बनने की संभावना नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘आने वाले दशक में युवा पीढ़ी के लिए रोजगार सृजन की गति यह तय करेगी कि डेमोग्रैफिक डिविडेंड आर्थिक लाभ में तब्दील होता है या नहीं।Ó
मगर रोजगार की सूरत यह है कि सिर्फ सात प्रतिशत पुरुष स्नातकों को डिग्री लेने के बाद पहले साल में नियमित वेतन वाली नौकरी मिल पाती है। ह्वाइट कॉलर जॉब्स की बात करें, तो यह संख्या महज 3.7 फीसदी है। तो रिपोर्ट में कहा गया है- ‘ये संख्याएं चिंताजनक सूरत की झलक हैं। सुरक्षित ह्वाइट कॉलर जॉब ढूंढना अत्यधिक दुर्लभ घटना बनी हुई है।Ó वैसे चिंताजनक अनेक अन्य आंकड़े भी रिपोर्ट में हैं। उनमें एक बेरोजगार स्नातकों की विस्फोटक ढंग से बढ़ती गई संख्या है। 2004 में 30 लाख स्नातक बेरोजगार थे। यह संख्या 2011 में 40 लाख पहुंच गई।
2011-17 में इसमें बेहद तेज रफ्तार से बढ़ोतरी हुई। 2023 तक ये तदाद एक करोड़ 10 लाख तक पहुंच चुकी थी। इन स्थितियों के साथ कोई देश आर्थिक महाशक्ति बनने की कैसी उम्मीद जोड़ सकता है? जो देश अपनी युवा श्रमशक्ति का पूरा उपयोग नहीं कर पाते, उनके संबंध में आम आर्थिक समझ है कि वे धनी होने से पहले बूढ़ा हो जाते हैं। विश्व बैंक की श्रेणी के मुताबिक भारत लगभग तीन हजार डॉलर सालाना प्रति व्यक्ति आय के साथ अभी भी निम्न- मध्यम आय वर्ग वाला देश है। यानी धनी होने के पहले उसे उच्च मध्य वर्ग की श्रेणी (4,500 से 14000 डॉलर) पार करनी है। जबकि युवा आबादी की संख्या में वृद्धि के अब सिर्फ चार साल बाकी हैं।
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