-कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि
मिल्कीपुर-अयोध्या 23 अप्रैल (आरएनएस)। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज के बायोटेक्नोलॉजी विभाग ने तराई और जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए धान की 25 नई प्रजातियां विकसित की हैं। ये किस्में जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती बाढ़ की समस्या से निपटने में किसानों के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगी। जलवायु परिवर्तन के कारण देश में बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे चावल उत्पादन के लिए बड़ी चुनौती उत्पन्न हो गई है। इसी को देखते हुए वैज्ञानिकों की टीम ने जैव रासायनिक लक्षणों एवं माइक्रोसेटेलाइट (एसएसआर) मार्कर विश्लेषण के माध्यम से जलमग्नता सहनशील किस्मों की पहचान की है। इस शोध में आलोक कुमार सिंह, देवेंद्र कुमार द्विवेदी, डॉ. नवाज अहमद खान और रंजीत कुमार सहित 12 वैज्ञानिकों की टीम ने 116 धान किस्मों का अध्ययन किया। इसमें सहनशील किस्म एफआर 13। और संवेदनशील चेक डीआरआर 44 को शामिल कर जलमग्न परिस्थितियों में परीक्षण किया गया। अध्ययन में 25 किस्मों ने बाढ़ के प्रति बेहतर सहनशीलता दिखाई। जैव रासायनिक विश्लेषण में पाया गया कि जलभराव से अधिकांश किस्मों में क्लोरोफिल, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का स्तर घट गया, लेकिन कुछ किस्मों में यह गिरावट कम रही। वहीं, तनाव सहनशीलता बढ़ाने वाला सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज़ एंजाइम 54 से 67 प्रतिशत तक बढ़ गया। ऊर्जा उपयोग से जुड़े एमाइलेज एंजाइम में 10 से 51 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। आणविक विश्लेषण में आठ सब1 जीन-विशिष्ट एसएसआर मार्करों का उपयोग किया गया। आरएम316 और आरएम 8300 मार्कर सहनशील और संवेदनशील किस्मों में अंतर करने में सबसे प्रभावी पाए गए।समग्र परिणामों में आईआर15एफ1896, आईआर18ए1876 और आईआर18ए1967 जैसी किस्मों ने जैव रासायनिक और आणविक दोनों स्तरों पर जलमग्नता सहनशीलता प्रदर्शित की। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन किस्मों से भविष्य में बाढ़-प्रतिरोधी और अधिक उपज देने वाली नई प्रजातियां विकसित की जा सकेंगी। प्रोफेसर डॉ. नवाज अहमद खान ने बताया कि यह शोध बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के किसानों को राहत देगा और बदलती जलवायु में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि किसानों को इन किस्मों के बीज मिलने में लगभग 2 वर्ष लगेंगे।
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