नई दिल्ली,22 जून(आरएनएस)। भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून देश की कृषि और जल सुरक्षा की असली जीवन रेखा है. लेकिन साल 2026 के सीजन की शुरुआत में ही इसके कदम बुरी तरह लडख़ड़ा गए हैं. मानसून की इस धीमी रफ्तार ने मौसम विज्ञानियों, किसानों और नीति निर्माताओं की माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं.
जून के मध्य तक के आंकड़े बेहद डराने वाले हैं. इस अवधि में देश के भीतर सामान्य रूप से 53.7 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन इसके मुकाबले केवल 19.2 मिमी बारिश ही दर्ज की गई है. यह सामान्य से 64त्न की भारी कमी को दर्शाता है. फिलहाल मानसून की रफ्तार मध्य भारत के बड़े हिस्सों में थम सी गई है. इसी को देखते हुए महाराष्ट्र सहित कई राज्यों ने किसानों को एक विशेष सलाह दी है. सरकार ने कहा है कि जब तक पर्याप्त और भरोसेमंद बारिश नहीं हो जाती, तब तक वे खरीफ फसलों की बुवाई में बिल्कुल जल्दबाजी न करें.
मानसून की इस कमजोर शुरुआत की तुलना भारत के सबसे मुश्किल वर्षों से की जा रही है. विशेषज्ञ इसकी तुलना साल 1987, 2009 और 2015 के हालातों से कर रहे हैं. भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इस सीजन में दीर्घकालिक औसत के लगभग 90त्न बारिश होने का पूर्वानुमान जताया है.
यदि मानसून इसी अनुमान के आसपास समाप्त होता है, तो 2026 का मानसून साल 2015 के बाद से भारत का सबसे सूखा साल बन जाएगा. इतना ही नहीं, यह पिछले एक दशक से अधिक समय में देश का सबसे कमजोर मानसून भी साबित होगा.
यह तुलना इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने साल 2016 के बाद से मुख्य रूप से सामान्य या सामान्य के करीब ही मानसून सीजन का आनंद लिया है. आखिरी बार देश में लगातार दो साल (2014 और 2015 में) कमजोर मानसून देखा गया था. ये दोनों ही साल प्रशांत महासागर में बनने वाली मजबूत एल नीनो की स्थिति से जुड़े हुए थे.
अक्सर पूरे सीजन की कुल बारिश के मुकाबले बारिश का सही समय पर होना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. किसान आमतौर पर जून के दौरान धान, दलहन (दालें), कपास और तिलहन की बुवाई शुरू करते हैं. मानसून में लंबे समय की देरी फसल के बढऩे के समय को कम कर सकती है, पैदावार घटा सकती है और किसानों को फसल का पैटर्न बदलने पर मजबूर कर सकती है.
महाराष्ट्र में, 1 से 15 जून के दौरान सामान्य रूप से होने वाली 103.8 मिमी बारिश के मुकाबले केवल 27.4 मिमी बारिश दर्ज की गई है, जिसके चलते अधिकारियों को किसानों को बुवाई के लिए इंतजार करने की सलाह देनी पड़ी. ऐसा ही एहतियात कई अन्य बारिश-आधारित क्षेत्रों में भी देखा जा रहा है जहां किसान छिटपुट बौछारों के बजाय लगातार होने वाली बारिश का इंतजार कर रहे हैं.
इस स्थिति ने साल 2014 की यादें ताजा कर दी हैं, जब देरी से हुई बारिश ने खरीफ की बुवाई की रफ्तार धीमी कर दी थी. अंतत: वह हाल के इतिहास में कृषि के लिए सबसे कमजोर वर्षों में से एक साबित हुआ था.
शुरुआत चिंताजनक होने के बावजूद, विशेषज्ञ मानसून के अंतिम नतीजों को लेकर अभी से कोई भी निष्कर्ष निकालने के खिलाफ चेतावनी दे रहे हैं. टेरी यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफेसर और जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ प्रो. एस.एन. मिश्रा ने कहा कि हर मानसून सीजन अपने आप में अलग होता है, क्योंकि समय और क्षेत्रों के हिसाब से बारिश में काफी बदलाव आता है.
उन्होंने कहा, हालांकि जून के पहले तीन हफ्तों के दौरान बारिश की कमी काफी ज्यादा है और जून के अंत तक स्थितियों में बड़े सुधार की उम्मीद कम है, फिर भी पूरे सीजन को लेकर अभी से कोई अंतिम राय बनाना जल्दबाजी होगी. मिश्रा के अनुसार, भारत की सीजन की लगभग 65-70त्न बारिश जुलाई और अगस्त के दौरान होती है, जिसका मतलब है कि मानसून में सुधार की संभावना पूरी तरह बनी हुई है.
साल 1987 और 2009 के सूखे के वर्ष दिखाते हैं कि कैसे जून में ठप पड़ा मानसून आगे चलकर एक बड़े राष्ट्रीय संकट का रूप ले सकता है. लेकिन 2015 जैसे वर्ष यह भी साबित करते हैं कि कमजोर शुरुआत के बाद भी मानसून में शानदार रिकवरी हो सकती है.
फिलहाल जो बात बिल्कुल साफ है वो यह कि भारत पिछले एक दशक से भी अधिक समय में अपने सबसे कमजोर मानसून आगाज़ का सामना कर रहा है. अब साल 2026 देश के बड़े सूखा वर्षों की सूची में शामिल होगा या फिर दमदार वापसी करेगा, यह काफी हद तक जुलाई और अगस्त के महीनों पर निर्भर करेगा. यही वो दो महीने हैं जो भारत के मानसून की किस्मत का फैसला करते हैं.
००
Login
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

