अमेरिका का मकसद एआई तकनीक में अपने करीब किसी को ना पहुंचने देना है। इस तरह वह फ्रंटियर एआई मॉडलों को राष्ट्रीय-सुरक्षा संपत्ति में बदल रहा है, जिन्हें अब तक वाणिज्यिक उत्पाद समझा जाता था।
अमेरिका ने एंथ्रोपिक कंपनी के दो सबसे उन्नत एआई मॉडलों फेबल-5 और माइथोस-5 तक विदेशी नागरिकों की पहुंच रोक दी है। यह प्रतिबंध न केवल अमेरिका से बाहर मौजूद यूजर्स पर लागू हुआ है, बल्कि अमेरिका-वासी विदेशी नागरिक भी इन मॉडलों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे, जिनमें खुद एंथ्रोपिक कंपनी के विदेशी कर्मचारी भी शामिल हैं। इसे अमेरिका सरकार की प्रतिमान बदल देने वाली कार्रवाई समझा गया है। स्पष्टत: इसे सिर्फ सेंसरशिप या साइबर सुरक्षा के जाने-पहचाने नजरिए से देखना उचित नहीं होगा।
यहां अमेरिका ने प्रतिबंध सिर्फ अपने शत्रु या प्रतिद्वंद्वी देशों पर नहीं, बल्कि तमाम देशों के नागरिकों पर लगाई है, जिसमें उसके सहयोगी और दोस्त देश भी शामिल हैं। इसे रेखांकित किया जाना चाहिए कि एंथ्रोपिक कंपनी को आदेश देते वक्त डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने कारण वैश्विक एआई सुरक्षा को बढ़ावा देना, जिम्मेदार आविष्कार का समर्थन, या खुलापन वाले तकनीकी माहौल का निर्माण- नहीं बताया। बल्कि दो टूक कहा कि मकसद एआई के क्षेत्र में अमेरिका का वैश्विक प्रभुत्व बनाए रखना है। कहा कि ये कार्रवाई सुनिश्चित करेगी कि अमेरिका एआई आविष्कार में सबसे आगे बना रहे। कहा जा सकता है कि अमेरिकी सरकार की यह असामान्य रूप से ईमानदार भाषा है।
यह बताती है कि उसके लिए मुद्दा सबसे नई तकनीक में अमेरिकी ताकत के करीब किसी को ना पहुंचने देना है। इस तरह अमेरिका सरकार ने अग्रणी (फ्रंटियर) एआई मॉडलों को राष्ट्रीय-सुरक्षा संपत्ति में बदलने की शुरुआत कर दी है, जिन्हें अब तक वाणिज्यिक उत्पाद समझा जाता था। भारत सहित दुनिया के बहुत से देशों की कंपनियों और संस्थाओं की समझ थी कि वे फीस चुका कर अमेरिका में विकसित हो रही नई तकनीक का फायदा उठाते रह सकेंगे। मगर अब साफ कर दिया गया है कि किस तकनीक की किस हद तक सेवा वे खरीद सकेंगे, यह अमेरिका सरकार तय करेगी। अब यह भारत जैसे देशों को सोचना है कि उनके सामने क्या विकल्प है और अमेरिकी तकनीक के भरोसे चलना कितना मुफीद है? सच यह है कि तकनीक संप्रभुता पर ध्यान देकर भारत ने अपने हितों से समझौता किया है। अब कीमत चुकाने का वक्त है।
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