सतीश झा
सोनम वांगचुक का आंदोलन एक प्रश्नपत्र से आगे बढ़ जाता है। वे केवल परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही नहीं माँग रहे। वे उस सोच पर प्रश्न उठा रहे हैं, जिसने शिक्षा को छँटनी की मशीन बना दिया है। उनके भीतर छिपा प्रश्न कहीं बड़ा है—क्या भारत अपने युवाओं का भविष्य बना रहा है, या केवल उनका क्रम तय कर रहा है? यही प्रश्न उनके पूरे सार्वजनिक जीवन को समझने की कुंजी भी है।
लोकतंत्र जब नागरिक से उसकी जान माँगने लगे
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विफलता तब नहीं होती, जब सरकार कोई गलत फैसला ले। सरकारें गलतियाँ करती हैं और उन्हें सुधारने का अवसर भी होता है। असली विफलता तब होती है, जब किसी नागरिक को अपनी बात सुनाने के लिए अपने शरीर को ही आखऱिी तर्क बनाना पड़े। किसी भी गणतंत्र में ऐसा नहीं होना चाहिए कि सत्ता किसी नागरिक की बात तब सुने, जब डॉक्टर चेतावनी दे चुके हों, अदालत हस्तक्षेप कर चुकी हो और उसका शरीर जवाब देने लगा हो। राज्य के भीतर कहीं न कहीं ऐसा दरवाज़ा अवश्य होना चाहिए, जहाँ किसी नागरिक की गंभीर और सार्वजनिक महत्व की शिकायत इसलिए सुनी जाए कि वह न्यायसंगत है, इसलिए नहीं कि वह मरने के कगार पर पहुँच गया है।
18 जुलाई 2026 को सोनम वांगचुक को दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इक्कीस दिन के उपवास ने उनके शरीर को बुरी तरह तोड़ दिया था। उन्होंने 28 जून को आमरण अनशन शुरू किया था। उनका संघर्ष किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं था। वे उन लाखों युवाओं के पक्ष में खड़े थे, जिनका विश्वास प्रश्नपत्र लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं की अव्यवस्था ने तोड़ दिया। दिल्ली हाईकोर्ट को भी उनके स्वास्थ्य की निगरानी का निर्देश देना पड़ा। एक ऐसा प्रश्न, जिसका उत्तर लोकतांत्रिक संवाद से दिया जाना चाहिए था, धीरे-धीरे एक नागरिक की शारीरिक सहनशक्ति और राज्य की संवेदनशीलता की परीक्षा बन गया।
पहली नजऱ में यह विवाद केवल प्रश्नपत्र लीक का दिखाई देता है। परीक्षा रद्द हुई, अनियमितताओं के आरोप लगे, जवाबदेही की माँग उठी और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक की आवाज़ पहुँची। यह सब गंभीर है, क्योंकि प्रश्नपत्र लीक केवल परीक्षा में धांधली नहीं है। यह उस भरोसे की हत्या है, जिसके सहारे करोड़ों युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं। राज्य उनसे वादा करता है कि मेहनत और योग्यता का निष्पक्ष मूल्यांकन होगा। प्रश्नपत्र लीक उसी वादे का विश्वासघात है।
लेकिन यदि हम यहीं रुक जाएँ, तो सबसे बड़ा प्रश्न छूट जाएगा।
मान लीजिए भारत की हर परीक्षा पूरी तरह निष्पक्ष हो जाए। कहीं कोई प्रश्नपत्र लीक न हो, कोई नकल न हो, कोई भ्रष्टाचार न हो। क्या तब हमारी शिक्षा व्यवस्था सफल मानी जाएगी?
उत्तर शायद फिर भी ‘नहींÓ होगा।
क्योंकि परीक्षा और शिक्षा एक ही चीज़ नहीं हैं।
परीक्षा चुनती है, शिक्षा बनाती है। परीक्षा यह तय करती है कि सौ उम्मीदवारों में एक कौन आगे जाएगा। शिक्षा का दायित्व यह है कि सौ में सौ अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच सकें। भारत ने इन दोनों के बीच का अंतर धीरे-धीरे भुला दिया है। हमने शिक्षा को प्रतियोगी परीक्षा का पर्याय बना दिया है। हर समस्या का समाधान हमें परीक्षा सुधार में दिखाई देता है—सुरक्षा बढ़ाइए, कैमरे लगाइए, डिजिटल निगरानी कीजिए, प्रश्नपत्र और सुरक्षित कर दीजिए। यह सब आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
असल प्रश्न यह है कि बाकी निन्यानवे युवाओं का क्या होगा?
आज अधिकांश प्रतियोगी परीक्षाएँ ज्ञान का उत्सव नहीं, अवसरों की कमी का प्रबंधन बन गई हैं। जब एक सीट के लिए हजारों उम्मीदवार खड़े हों, तो परीक्षा योग्यता जितनी नहीं, दुर्लभ अवसरों की चौकीदारी उतनी करती है। वह कुछ लोगों को सफलता का प्रमाणपत्र देती है और बाकी लाखों को असफलता का बोझ। फिर व्यवस्था बड़ी सहजता से कह देती है कि दूसरा उम्मीदवार अधिक योग्य था। बहुत कम लोग यह पूछते हैं कि सौ योग्य युवाओं के लिए अवसर केवल एक ही क्यों था।
धीरे-धीरे व्यवस्था की विफलता व्यक्ति की विफलता में बदल दी जाती है। असफल छात्र से कहा जाता है कि वह और मेहनत करे, बेहतर कोचिंग ले, एक बार फिर प्रयास करे। लेकिन राज्य से यह नहीं पूछा जाता कि उसने पर्याप्त अवसर क्यों नहीं बनाए। शिक्षा का उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को सक्षम बनाना है; प्रतियोगी परीक्षा का उद्देश्य उनमें से कुछ को अलग कर देना। यही दोनों के बीच का सबसे बुनियादी अंतर है।
यहीं से सोनम वांगचुक का आंदोलन एक प्रश्नपत्र से आगे बढ़ जाता है। वे केवल परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही नहीं माँग रहे। वे उस सोच पर प्रश्न उठा रहे हैं, जिसने शिक्षा को छँटनी की मशीन बना दिया है। उनके भीतर छिपा प्रश्न कहीं बड़ा है—क्या भारत अपने युवाओं का भविष्य बना रहा है, या केवल उनका क्रम तय कर रहा है?
यही प्रश्न उनके पूरे सार्वजनिक जीवन को समझने की कुंजी भी है।
सोनम वांगचुक ने अपनी यात्रा विरोध से नहीं, निर्माण से शुरू की। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्होंने 1988 में लद्दाख में स्श्वष्टरूह्ररु की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें लगा कि वहाँ के बच्चे प्रतिभा के अभाव में नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था के कारण असफल घोषित किए जा रहे हैं, जो उनकी भाषा, उनके भूगोल और उनके जीवन से बिल्कुल अनजान है। बाद में उन्होंने जल संरक्षण, निष्क्रिय सौर ऊर्जा, टिकाऊ निर्माण और आइस स्तूप जैसी तकनीकों पर काम किया। उनका तरीका हमेशा एक जैसा रहा—पहले समस्या को समझो, फिर उसका समाधान विकसित करो और अंत में स्वयं उसकी जिम्मेदारी उठाओ। इसी काम ने उन्हें 2018 का रैमन मैग्सेसे पुरस्कार दिलाया।
यही कारण है कि सोनम वांगचुक का नैतिक प्रभाव केवल इसलिए नहीं है कि वे सरकार की आलोचना करते हैं। भारत में सरकारों की आलोचना करने वालों की कमी नहीं है। उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने पहले काम किया, फिर बोलना शुरू किया। शिक्षा, पर्यावरण, स्थानीय समाज और लोकतांत्रिक जवाबदेही—पहली नजऱ में ये अलग-अलग विषय लगते हैं, लेकिन इनके पीछे एक ही विचार काम करता है—विकास मनुष्य के लिए होना चाहिए, मनुष्य विकास के लिए नहीं।
इसीलिए उनके हर विचार से सहमत होना आवश्यक नहीं, लेकिन उन्हें गंभीरता से सुनना आवश्यक है। लोकतंत्र में नैतिक अधिकार पद, प्रसिद्धि या लोकप्रियता से नहीं मिलता। वह जीवन भर किए गए काम से अर्जित होता है।
यहीं से असली प्रश्न शुरू होता है।
क्या भारतीय गणतंत्र आज भी अपने सबसे गंभीर नागरिकों को बिना उनकी जान जोखिम में डाले सुनने की क्षमता रखता है?
नागरिक पहले संदिग्ध, फिर नागरिक
सोनम वांगचुक का महत्व केवल उनके काम में नहीं, बल्कि उस तरह की नागरिकता में है जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं।
वे किसी राजनीतिक दल के नेता नहीं हैं। चुनाव नहीं लड़ते। सत्ता प्राप्त करना उनका लक्ष्य नहीं रहा। फिर भी वे बार-बार राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ जाते हैं। इसका कारण उनकी लोकप्रियता नहीं, उनकी सार्वजनिक विश्वसनीयता है। उन्होंने शिक्षा पर काम किया, पर्यावरण पर किया, लद्दाख के स्थानीय समाज के साथ किया। इसलिए जब वे बोलते हैं, तो उनके शब्द केवल विचार नहीं रहते, अनुभव का भार भी साथ लाते हैं।
लेकिन लोकतंत्र का अर्थ किसी व्यक्ति को आलोचना से ऊपर उठा देना भी नहीं है।
2025 में लद्दाख में संवैधानिक संरक्षण और राज्य के दर्जे की माँग को लेकर आंदोलन हिंसक हो गया। जानें गईं। सरकार ने आरोप लगाया कि सोनम वांगचुक के कुछ बयानों ने वातावरण को भड़काया। वांगचुक ने इसे अस्वीकार किया और हिंसा को वर्षों से जमा असंतोष का परिणाम बताया। बाद में उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में भी रखा गया।
इन घटनाओं का फैसला नारों से नहीं हो सकता।
राज्य का दायित्व है कि वह हिंसा रोके, कानून लागू करे और यदि किसी व्यक्ति की भूमिका संदिग्ध हो तो उसकी निष्पक्ष जाँच करे। लेकिन उतना ही बड़ा दायित्व यह भी है कि वह आरोप को प्रमाण से सिद्ध करे। लोकतंत्र में सरकारी आदेश स्वयं प्रमाण नहीं होते। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे असाधारण कानूनों का औचित्य भी असाधारण साक्ष्यों से ही सिद्ध होना चाहिए।
यहीं आज का सबसे बड़ा संकट दिखाई देता है।
हमने असहमति पर बहस करना लगभग छोड़ दिया है। किसी नागरिक के तर्क का उत्तर देने के बजाय पहले उसकी नीयत पर सवाल उठाया जाता है। उसे किसी राजनीतिक दल, विदेशी एजेंडे या छिपे षड्यंत्र से जोड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया में बहस समाप्त हो जाती है और व्यक्ति ही विवाद बन जाता है।
लोकतंत्र के लिए यह प्रवृत्ति खतरनाक है।
किसी नागरिक की बात केवल इसलिए गलत नहीं हो जाती कि उसने कभी किसी सरकार का समर्थन किया था। उसी तरह वह केवल इसलिए सही भी नहीं हो जाती कि उसने सरकार का विरोध किया है। लोकतंत्र व्यक्ति की निष्ठा नहीं, उसके तर्क की परीक्षा लेता है।
सोनम वांगचुक पर भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए।
उनकी हर माँग स्वीकार करना आवश्यक नहीं। उनके हर समाधान से सहमत होना भी आवश्यक नहीं। लेकिन उनके तर्कों का उत्तर तथ्यों और विवेक से दिया जाना चाहिए, आरोपों और विशेषणों से नहीं।
इसी संदर्भ में उनकी भूख हड़ताल भी एक कठिन प्रश्न खड़ा करती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल इस आधार पर नीतियाँ नहीं बदल सकती कि कौन अपने शरीर पर सबसे अधिक कष्ट सह सकता है। यदि ऐसा होने लगे तो संसद, न्यायालय और संस्थागत प्रक्रियाओं का महत्व कम हो जाएगा। लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही सत्य है कि यदि संवाद के सारे सामान्य रास्ते बंद हो जाएँ, तो नागरिक के पास बचता ही क्या है?
यहीं भूख हड़ताल लोकतंत्र की पहली भाषा नहीं, उसकी विफलता बन जाती है।
कोई भी स्वस्थ लोकतंत्र यह नहीं चाहेगा कि किसी नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए अपने जीवन को दाँव पर लगाना पड़े। यदि ऐसा हो रहा है, तो प्रश्न केवल आंदोलनकारी का नहीं, व्यवस्था का भी है।
दरअसल, भारतीय लोकतंत्र की एक गहरी विडंबना सामने आ रही है।
हम नागरिक से लगातार स्पष्टीकरण माँगते हैं—तुमने विरोध क्यों किया, मार्च क्यों निकाला, अनशन क्यों किया? लेकिन सरकार से अपेक्षा कम होती जा रही है कि वह बताए—समस्या इतनी दूर क्यों बढ़ी कि नागरिक को अनशन करना पड़ा?
यहीं लोकतंत्र का संतुलन बिगडऩे लगता है।
चुनाव सरकार को शासन का अधिकार देते हैं, लेकिन नागरिक से संवाद करने के दायित्व से मुक्त नहीं करते। बहुमत निर्णय लेने का अधिकार देता है, असहमति को अनसुना करने का नहीं।
सोनम वांगचुक की पूरी सार्वजनिक यात्रा अंतत: इसी प्रश्न पर आकर ठहरती है।
वे भारत से यह नहीं पूछ रहे कि सरकार बदली जाए या कोई नई विचारधारा लाई जाए। उनका प्रश्न कहीं अधिक बुनियादी है— क्या इस गणतंत्र में अब भी ऐसा स्थान बचा है, जहाँ एक जिम्मेदार नागरिक की बात उसकी नैतिक विश्वसनीयता के आधार पर सुनी जाए, या अब उसे सुने जाने के लिए अपने शरीर को ही आखऱिी तर्क बनाना होगा?
यही प्रश्न केवल सोनम वांगचुक का नहीं है।
यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की भी परीक्षा है।
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