*संत किसी दल के नहीं होते, वे भगवान के होते हैं : भावानंद महाराज
मीरजापुर,22 नवंबर (आरएनएस)। लालगंज तहसील क्षेत्र के जयकर परमहंस आश्रम में गुरुवार को सत्संग और कथा का माहौल ऐसा रहा कि सुबह से ही श्रद्धालु संतवाणी सुनने उमड़ पड़े। भक्ति, भजन और आध्यात्मिक चर्चा के बीच भावानंद महाराज ने जीवन, अनुशासन और ज्ञान पर विस्तार से उपदेश दिया। महाराज ने कहा कि जीवात्मा को हंस इसलिए कहा गया है कि वह सार को ग्रहण कर सकता है और व्यर्थ को छोड़ सकता है। उन्होंने बताया कि मनुष्य के चेतन में दो प्रमुख दोष, मोह और अहंकार जमे रहते हैं। जिन्हें केवल सद्गुरु की शरण ही दूर कर सकती है। उन्होंने कहा कि गुरु के संरक्षण में आने से मन के पाप, रोग और दोष नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है।भावानंद महाराज ने कहा कि संसार में स्थायी सहारा केवल भगवान राम ही हैं। बाकी दुनिया अस्थायी है। इसलिए मनुष्य को अपनी आशा और विश्वास उसी ईश्वर से रखना चाहिए जो सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान है। उन्होंने कहा कि मनुष्य भगवान का अंश है।इसलिए उसे अपने भीतर दिव्यता खोजनी चाहिए।नशे को उन्होंने गरीबी, मूर्खता और पतन की जड़ बताया। महाराज ने कहा कि नशा मनुष्य को बुद्धिहीन बना देता है। त्याग और संयम ही वास्तविक धन हैं। अनुशासनहीन व्यक्ति जीवनभर दुख और भटकाव में रहता है, जबकि अनुशासित व्यक्ति ही आगे बढ़ता है। सत्संग की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि संत किसी दल के नहीं होते, वे भगवान के होते हैं। संतों की संगति से सद्भाव, सद्विचार और कल्याण की दिशा मिलती है।उन्होंने यथार्थ गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान कृष्ण की वाणी मन को पवित्र करती है।पवित्रता जल स्नान से नहीं ज्ञान से आती है।आश्रम परिसर में दिनभर आध्यात्मिक कार्यक्रम चलता रहा। अंत में भंडारे में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
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