अजय दीक्षित
संसद में जिस प्रकार से चुनाव आयोग, चुनाव परिणामों और रिफॉर्म्स पर कांग्रेस और उनके नेता बहस करते नजर आ रहे हैं उससे यह लगता है कि राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस जटिलताओं से घिर गईं है। राहुल गांधी को अभी भी समझ में नहीं आ रहा है कि पहले हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली,अब बिहार विधानसभा चुनावों में अपने साथी दलों में समन्वय में कमी और मुद्दों के दिवालिया पन हारी है और उसके बाद भी राहुल गांधी चुनाव आयोग को दोषी मानते हैं और वोट चोरी जैसे आंदोलन करते हैं। इतना ही नहीं वर्तमान सत्र में कांग्रेस इन्हीं मुद्दों पर सरकार को घेरना चाहती है और भारतीय जनता पार्टी जैसी चतुर पार्टी कांग्रेस को बंदे मातरम् जैसे अपने एजेंडा पर ले आती है और कांग्रेस के पुरखो को भी घसीट रही है। कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े, जयराम रमेश, बेनुगोपाल, मनोज झा, प्रमोद तिवारी,भी हड़प्रभ है कि राहुल गांधी को किशप्रकार समझाए।यद्यपि सरकार के मुद्दों की कमी नहीं परंतु नेताओं में कमी है कि वह जनमानस के मुद्दों पर बहस नहीं करना चाहते हैं।वरना महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, कानून व्यवस्था, विकास, पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा,ऐसे मुद्दे हो सकते हैं जिन पर सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा जा सकता है। लेकिन कांग्रेस की जटिलताओं का पार नहीं है।वे घूम फिर कर मुस्लिम तुष्टिकरण, मतदाता सूचियों में गहन परीक्षण एसआईआर, ईवीएम पर आ जाते हैं और सरकार भी यही चाहती है क्योंकि उसके वोट बैंक में ये मुद्दे सटीक बैठते हैं।2024 के आम चुनाव में कांग्रेस 100 सीट जीतकर भारतीय जनता पार्टी के विजय रफ्तार को कुछ विराम लगाया था । केंद्र सरकार जेडीयू और टीडीपी की बैसाखियों पर आ गई थी मगर डेढ़ वर्ष में सब किया धरा समाप्त कर दिया। नौबत यहां तक आ गई कि हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार विधानसभा चुनावों में हार चुकी है और 2026 में होने वाले पश्चिमी बंगाल, असम, तमिलनाडु,केरल विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस की नैया पार नहीं लगने वाली क्योंकि पश्चिमी उत्तर में तो कांग्रेस से तुड़मूल ने नाता तोड़ लिया है,असम में भारतीय जनता पार्टी से सीधी लड़ाई है, तमिलनाडु में जूनियर पार्टनर की तरफ डीएमके के साथ लड़ेगी ।केरल में वामपंथियों से मुकाबला है वहीं कांग्रेस को कुछ उम्मीद है।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जम्मू कश्मीर, छत्तीसगढ़,में कांग्रेस कमजोर आलाकमान के चलते अनिर्णय की स्थिति में है और झारखंड में तो बकायदा हेमंत सोरेन के बारे में कहा जा रहा है कि वह कभी भी भारतीय जनता पार्टी के गोद में बैठे मिलें । कर्नाटक, डीके शिवकुमार और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की लड़ाई में बदनाम हो चली है और राहुल गांधी कोई फैसला नहीं कर पा रहे हैं।यही हालत हिमाचल प्रदेश के हैं और यह सरकार तो इसलिए टिकी है कि भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने प्रदेश को कांग्रेस सरकार गिराने से इंकार कर दिया है। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट खींच तान मचाए है। मप्र में कांग्रेस कमलनाथ, दिग्विजय सिंह,को हाशिए पर डाले हैं।जीतू पटवारी की दिग्विजय सिंह से नहीं पटती और दोनों इंदौर से है। पंजाब में नवज्योति सिंह सिद्धू ने आरोप लगाया है कि कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री बनने के लिए पांच सौ करोड़ का सूटकेस चाहिए। दिल्ली में कांग्रेस तीसरी पार्टी है, ओडिशा में तो मालूम ही नहीं कि कांग्रेस कहां है। पूर्वोत्तर राज्यों में कांग्रेस खत्म हो गई है।
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