अनिल काकोडकर
विकासित भारत को साकार करने के लिए बड़े पैमाने पर नाभिकीय ऊर्जा का तेज़ी से इस्तेमाल ज़रूरी हो गया है। स्वच्छ ऊर्जा तक पहुँच के अलावा, नाभिकीय ऊर्जा लंबे समय तक चलने वाली ऊर्जा और जलवायु सुरक्षा का भी वादा करती है। परमाणु ऊर्जा विभाग की लगातार और आत्मनिर्भर बनने कोशिशों की वजह से, भारत एक आत्मनिर्भर, जि़म्मेदार देश के तौर पर उभरा है, जिसके पास प्रगत नाभिकीय प्रौद्योगिकी है, भले ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने हम पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हों। देश अब नाभिकीय ऊर्जा मिशन के साल 2047 तक 100 जीडब्ल्यू बिजली बनाने की क्षमता तक पहुँचने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए प्रौद्योगिकी के मामले में तैयार है। हालाँकि यह बहुत महत्वांकांक्षी लग सकता है, लेकिन हमारे पिछले ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, पॉलिसी की पहल और काम, खासकर कानूनी कदम जो अभिप्रेत हैं, उनसे चुनौतियों से निपटने में मदद मिलेगी। स्वच्छ ऊर्जा हासिल करने और जलवायु खतरे से निपटने के अलावा, नाभिकीय ऊर्जा मिशन में अर्थव्यवस्था को काफ़ी बढ़ावा देने की क्षमता है क्योंकि पूरी वैल्यू चेन देश के अंदर होगी। इससे मटीरियल, मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, कमीशनिंग, ऑपरेशन और मेंटेनेंस, क्वालिटी एश्योरेंस, सेफ्टी और आस-पड़ोस के लोगों से जुड़ाव जैसी सभी गतिविधियों में सभी स्तर पर नौकरियाँ पैदा होंगी। प्रशिक्षित और योग्य मानव संसाधन के मामले में भी चुनौतियां हैं। हालांकि हम इन सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए अच्छी स्थिति में हैं, लेकिन प्रोग्राम की निरंतरता पर उद्योग का भरोसा एक अनिवार्य शर्त होगी।
आगे क्या चुनौतियां हैं? उनमें से सबसे ज़रूरी है समय लक्ष्य के हिसाब से बड़े पैमाने पर तेज़ी से परिनियोजन करना। सिफऱ् दो दशकों में 90 जीडब्ल्यू से ज़्यादा या लगभग 200 रिएक्टर जोड़े जाने हैं। स्पष्ट है कि एनपीसीआईएल, एनटीपीसी और भाविनी के अलावा कई इम्प्लीमेंटिंग एजेंसियों की ज़रूरत है, जो फ्लीट मोड में रिएक्टर प्लांट के मानक डिज़ाइन वाली परियोजना शुरू करें। हालांकि हमें अपनी राष्ट्रीय नाभिकीय ऊर्जा नीति के आधार पर प्रौद्योगिकी के साथ प्रोग्राम को परिनियोजित करना चाहिए । पीएचडब्ल्यूआर प्रौद्योगिकी स्पष्ट रूप से एक सिद्ध और किफायती प्रतिस्पर्धी स्वदेशी प्रौद्योगिकी है जो तेज़ी से आगे बढऩे के लिए तैयार है। इसलिए एनपीसीआईएल को अपने प्रोग्राम को कार्यान्वित करते समय पीएचडब्ल्यूआर प्रौद्योगिकी में दूसरी प्राधिकरणों को रचनात्मक रूप अपने से जोड़ते हुए उनका मार्गदर्शन करना चाहिए। दूसरी परिपक्व प्रौद्योगिकी को भी एक अतिरिक्त संभावना के तौर पर माना जा सकता है, बशर्ते वे किफायती और संरक्षा मानकों को पूरा करें।
निवेश का भी एक ज़रूरी मुद्दा है, जो अकेले नाभिकीय ऊर्जा उपयोगिता क्षेत्र के लिए 20 लाख करोड़ के ऑर्डर का होगा। ईंधन चक्र अवसंरचना के लिए निवेश इसके अलावा होगा। इसलिए निजी क्षेत्र से वित्तपोषण बहुत ज़रूरी है। जबकि नाभिकीय क्षेत्र का आर्थिक पक्ष अच्छा है, दूसरी स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी के बराबर नीति सहयोग अनिवार्य होगा।
निर्धारित क्षमता के लिए नाभिकीय ईंधन हासिल करना अगली बड़ी चुनौती है। जबकि वैश्विक यूरेनियम स्रोत काफी हैं, नाभिकीय ऊर्जा विस्तार के कारण यूरेनियम की बढ़ती मांग और यूरेनियम आपूर्ति पर रुकावटों से अंतरिम आपूर्ति में कमी और मूल्य में वृद्धि होगी। नाभिकीय बाज़ार से जुड़ी जटिल भू-राजनीति को देखते हुए यह एक बड़ी ईंधन आपूर्ति सुरक्षा चुनौती बन सकती है। इसलिए अपने बड़े थोरियम भंडारों के साथ भारत को जल्द से जल्द थोरियम पर स्विच कर लेना चाहिए और ऊर्जा सुरक्षित बनना चाहिए। इसके लिए हमारे थोरियम आधारित नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम और उससे जुड़ी प्रौद्योगिकी के विकास में तेज़ी लाने की ज़रूरत है। थोरियम का इस्तेमाल और यूरेनियम से बहुत ज़्यादा एनर्जी वैल्यू पाना, जो किसी भी तरह से आज के समय की ज़रूरत बन जाएगी, इसमें नाभिकीय ऊर्जा का पुनर्संसाधन और पुनर्चक्रण करना ज़रूरी होगा। इस तरह संवृत नाभिकीय ईंधन चक्र में हमारी काबिलियत एक सुरक्षित और अनवरत ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने और भरोसेमंद दीर्घकालिक नाभिकीय अपशिष्ट प्रबंधन में काम आएगी। हालांकि, यह एक संवेदनशील व नाभिकीय प्रौद्योगिकी है और इसका शासन और नियंत्रण सरकार के पास ही रहना चाहिए। अमेरिका सहित ज़्यादातर देश इस्तेमाल किए गए नाभिकीय ईंधन के स्थाई निपटान का मुद्दा नहीं सुलझा पाए हैं। निजी नाभिकीय प्रतिष्ठान और सरकारी नाभिकीय पुनर्चक्रण ऊद्योग के बीच ईंधन प्रबंधन इंटरफेस को कानून में ठीक से शामिल करने की ज़रूरत है।
मुझे लगता है कि दुनिया भर में नाभिकीय ऊर्जा को ज़्यादा बढ़ावा देने के कारण, नाभिकीय पुनर्चक्रण पर ज़्यादा ज़ोर देना ज़रूरी होगा। इस तरह, फ्रंट एंड की तुलना में बैकएंड ईंधन चक्र, उतना ही बड़ा या उससे भी बड़ा उद्योग बन जाएगा। थोरियम, जो प्रसार प्रतिरोध उपलब्ध कराता है, इस मामले में और भी ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है।
हमें यह मानना होगा कि हमारे पीएचडब्ल्यूआर सिस्टम सबसे ज़्यादा लचीले हैं और कई तरह के ईंधन च्रक को सरल बनाने के लिए सबसे सही हैं, खासकर थोरियम की ओर हमारे संक्रमण की योजना के मामले में। जबकि थोरियम को विखडनीय यूरेनियम-233 में बड़े पैमाने पर बदलने के लिए द्रुत प्रजनक विकास को तेज़ करने की ज़रूरत है, अब जब हम आयातित यूरेनियम का इस्तेमाल करके बड़ी पीएचडब्ल्यूआर क्षमता सेट अप कर सकते हैं, तो पीएचडब्ल्यूआर ऐसा करने और थोरियम के इस्तेमाल की दिशा में हमारी तरक्की को तेज़ करने का एक आसान विकल्प देते हैं। इस मकसद के लिए ज़रूरी विकास का काम परमाणु ऊर्जा विभाग में अनुसंधान एवं विकास पर मुख्यत: केंद्रित होना चाहिए, भले ही सरकारी और निजी क्षेत्र में नाभिकीय स्थापनाएं मानकीकृत और सिद्ध डिज़ाइन का इस्तेमाल करके तेज़ी से क्षमता बढ़ा रही हों।
हम आशा कर सकते हैं कि प्रस्तावित नाभिकीय विधेयक सभी हितधारकों की चिंताओं को दूर करेगा, जिसमें ऊपर बताए गए कुछ हितधारक भी शामिल हैं और नाभिकीय ऊर्जा मिशन को उम्मीद के मुताबिक लक्ष्य हासिल करने में मदद करेगा।
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