ग्रामीण विद्युतीकरण: रोशनी के साथ विकास का उजाला
विकास शर्मा
केन्द्र सरकार हाल ही में ग्रामीण विकास के लिए एकीकृत योजना वी बी जी राम जी लेकर आई है। इसके पीछे व्यापक नजरिया है कि ग्रामीण क्षेत्रों का टिकाऊ विकास हो। इसके लिए रोजगार सृजन और बुनियादी ढाँचा विकास पर बल दिया जाएगा। विकास की व्यापक कार्ययोजना को गति प्रदान करेगी विद्युत ऊर्जा जिसे मोदी सरकार ने अपने पिछले दो कार्यकाल में प्रमुखता प्रदान की थी। भारत जहाँ लगभग 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है वहाँ ग्राम और ग्रामीण की ऊर्जा संपन्नता ही विकसित भारत के लक्ष्य को परवान चढ़ाएगी। छत्तीसगढ़ को इस मामले में बढ़त हासिल है। छत्तीसगढ़ सिर्फ सरप्लस बिजली वाला राज्य नहीं बल्कि यहाँ की बिजली लोगों की समृद्धि का बड़ा कारक है। गौर करने वाली बात यह भी है कि राज्य बनने के पहले तकनीकी रूप से प्रदेश का बहुत बड़ा हिस्सा विद्युतीकृत हो चुका था पर उपभोक्ताओं की संख्या और वितरण गुणवत्ता के लिहाज से स्थिति बहुत निराशाजनक थी। बीते 25 वर्षों को इस लिहाज से अहम माना जा सकता है क्योंकि अब गाँव तकनीकी रूप से ही नहीं बल्कि जमीनी तौर पर विद्युतीकृत हैं।
पहला गाँव जहाँ आई बिजली
वैसे यह जानना रोचक है कि छत्तीसगढ़ में मध्यभारत प्रांत के दौर में (1 नवंबर 1956 के पूर्व) ग्राम विद्युतीकरण की शुरूआत हो गई थी। मोहला-मानपुर जिले के कुल्हारडोह गाँव को यह सौभाग्य मिला । यहाँ 1953 में बिजली आई, यह अलग बात है कि विद्युतीकरण की परिभाषा तब कुछ और थी। इसके बाद रायपुर जिले के अभनपुर ब्लॉक के मानिकचौरी गाँव में अगस्त 1956 में मध्यप्रदेश बनने के पहले तथा मध्यप्रदेश बनने के बाद सबसे पहले 31 दिसंबर 1956 में बस्तर जिले के जगदलपुर ब्लॉक के जीरागाँव में बिजली की दस्तक हुई। यह सिलसिला चल पड़ा एक –एक कर सभी जिलों में बिजली पहुँचती चली गई। वर्तमान 33 जिलों में से 06 जिलों के पहले ग्राम का विद्युतीकरण वर्ष 1970 में हो गया था।
बदलती रही प्राथमिकता
ग्रामीण विद्युतीकरण को लेकर सरकारों ने काम तो शुरू से किए पर प्राथमिकता का क्षेत्र बदलता रहा है। स्वतंत्रता बाद 50 के दशक में अनाज की पैदावार बढ़ाने के लिए सिंचाई के साथ ही लघु उद्यम को प्राथमिकता प्रदान की गई। 60 के दशक में अकाल के भयंकर दौर को देखते हुए विद्युतीकरण को सिंचाई पंपों के ऊर्जीकरण पर केंद्रित किया गया। 70 के दशक में सिंचाई पंपों के साथ मूलभूत अधोसंरचनाओं में बिजली उपलब्धता प्राथमिकता थी। 80 के बाद ग्रामीण आबादी तक बिजली की पहुँच को प्रमुखता दी गई। इधर बीता एक दशक बहुत अहम रहा है जब देश के हर गाँव और हर घर को रोशन करने का लक्ष्य रखा गया जिसे समय से पूर्व हासिल भी किया गया।
समय के साथ बदली परिभाषा
असल में बीते 78 वर्षों में ग्रामीण विद्युतीकरण की परिभाषा बदलती रही। 1947 के बाद लगभग पाँच दशक तक ( अक्टूबर 1997 तक) किसी गाँव के राजस्व क्षेत्र में बिजली का उपयोग किए जाने पर वह गाँव विद्युतीकृत माना गया। अक्टूबर 1997 के बाद इसमें बदलाव हुआ। किसी गाँव की राजस्व सीमा के अंदर रिहायशी क्षेत्र में बिजली का उपयोग किसी भी कार्य में किया गया ( औद्योगिक, व्यावसायिक या घरेलू) तो वह गाँव विद्युतीकृत कहा गया।
17 फरवरी 2004 के बाद ग्रामीण विद्युतीकरण की परिभाषा को अधिक प्रभावी बनाया गया। गाँव की आबादी वाले क्षेत्र में वितरण लाइन , ट्रांसफार्मर जैसी बुनियादी विद्युत अधोसंरचना स्थापित हो , साथ ही दलित बस्ती में भी ऐसी अधोसंरचना विकसित हो तथा गाँव के कुल घरों में कम से कम 10 प्रतिशत घरों में विद्युत की आपूर्ति की जा रही हो तब वह गाँव विद्युतीकृत माना गया।
योजनाओं ने बदली तस्वीर
ग्रामीण विद्युतीकरण को प्राथमिकता प्रदान करते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण विद्युतीकरण नीति ,2006 बनाई गई। सभी घरों में वर्ष 2009 तक बिजली पहुँचाने के साथ ही गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय बिजली की आपूर्ति का लक्ष्य रखा गया। साथ ही न्यूनतम जीवन रेखा खपत 01 यूनिट प्रति घर प्रतिदिन सुनिश्चित किया गया। इस लक्ष्य को पाने के लिए राजीव गाँधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (आरजीजीवीवाई) के रूप में एकीकृत योजना अप्रैल 2005 में शुरू की गई। इससे ग्रामीण विद्युतीकरण के काम में तेजी आई पर अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ग्रामीण क्षेत्र के घरेलू और कृषि दोनों ही श्रेणी के उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नवंबर 2014 को दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना ( डीडीयूजीजेवाई) शुरू की। इस योजना ने लक्ष्य आधारित परिणाम दिए हैं और आज ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण विदयुत आपूर्ति हो रही है।
रोशन करने चला अभियान
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ग्रामीण विद्युतीकरण के दायरे को आगे बढ़ाते हुए हर घर को रोशन करने का लक्ष्य निर्धारित किया। 25 सितंबर 2017 को प्रधानमंत्री हर घर मुफ्त बिजली योजना ( सौभाग्य) लागू की गई और 2019 तक हर घर को बिजली से रोशन करने का लक्ष्य रखा गया । ऑफ ग्रिड घरों को सौर ऊर्जा अथवा अन्य नवीकरणीय ऊर्जा माध्यमों से रोशन करना था। इसके सुखद परिणाम आए और आज देश के हर घर में बिजली की पहुँच हो चुकी है। 28 अप्रैल, 2018 भारत के लिए एक ऐतिहासिक दिन है क्योंकि इसी दिन मणिपुर का लेइसांग गांव विद्युतीकृत होने वाला अंतिम गांव बन गया। इस योजना के तहत छत्तीसगढ़ के ही 7 लाख 31 हजार से अधिक घरों में लोगों ने पहली बार बिजली के बल्ब से रोशनी देखी।
25 वर्ष पहले तत्कालीन परिभाषा अनुसार छत्तीसगढ़ में 19609 राजस्व गाँवों में से 17108 गाँव विद्युतीकृत थे जो वर्तमान में न केवल शत प्रतिशत विद्युतीकृत हैं अपितु शत-प्रतिशत घरों में बिजली की आपूर्ति हो रही है। आज प्रदेश के 18728 गाँव ग्रिड के माध्यम से तथा 881 गाँव ऑफ ग्रिड पद्धति से बिजली प्राप्त कर रहे हैं।
विकास का सूचक विदयुत खपत
देश में प्रति व्यक्ति औसत विदयुत खपत 1395 यूनिट जबकि छत्तीसगढ़ में 2211 यूनिट है। इस खपत के बड़े हिस्सेदार ग्रामीण और कृषि उपभोक्ता हैं। खपत का यह आँकड़ा महज दस्तावेजी नहीं । ग्रामीण विद्युतीकरण ने गाँवों के सामाजिक और आर्थिक विकास को व्यापक ढंग से प्रभावित किया है। आज यदि किसान दो से तीन फसल की पैदावार ले रहा है तो इसमें सवा आठ लाख कृषि सिंचाई पंपों का योगदान अहम है। खेती मानव श्रम पर अब भी आधारित है ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार पैदा हो रहे हैं वहीं आर्थिक सबलता से जीवन स्तर में काफी बदलाव आया है। ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों की भांति अनेक व्यावसायिक गतिविधियों ने स्थान बनाया है जो अंतत: विदयुत की निर्बाध आपूर्ति के कारण फल फूल रहे हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि ग्रामीण विद्युतीकरण के मजबूत आधार पर आगे बढ़ते हुए ग्रामीण विकास की नई योजना जी राम जी अपने दूरगामी लक्ष्य को प्राप्त करने में निसंदेह सफल होगी।
लेखक प्रबंधक ( जनसंपर्क एवं औद्योगिक संबंध) सीएसपीडीसीएल रायपुर (छत्तीसगढ़)हैं
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