लखनऊ 6 जनवरी (आरएनएस ) उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती बबिता सिंह चौहान ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा संचालित पारिवारिक विवाद निवारण क्लिनिक (थ्ंउपसल क्पेचनजम त्मेवसनजपवद ब्सपदपब दृ थ्क्त्ब्) को महिलाओं, बच्चों और परिवार के अधिकारों की रक्षा में एक अत्यंत सराहनीय, जन-केंद्रित और दूरदर्शी पहल बताया है।अध्यक्ष महोदया ने कहा कि इस क्लिनिक का मुख्य उद्देश्य पारिवारिक कलह, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीडऩ और वैवाहिक विवादों को दंडात्मक कार्रवाई के बजाय संवेदनशील परामर्श, मध्यस्थता और आपसी संवाद के माध्यम से सुलझाना है। इससे पीडि़त लंबी कानूनी प्रक्रिया, सामाजिक कलंक और मानसिक तनाव से बचते हैं। उन्होंने कहा कि यह पहल कानून और करुणा के बीच संतुलन स्थापित करती है और न्याय को अधिक मानवीय बनाती है।उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) पुलिस और शारदा विश्वविद्यालय के बीच हुए एमओयू से प्रारंभ यह प्रयोगात्मक पहल आज एक प्रभावी मॉडल के रूप में उभरी है। औपचारिक रूप से 10 जुलाई 2020 को उद्घाटित इस क्लिनिक ने पारिवारिक विवादों के समाधान का वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत किया है, जिससे न्यायालयों और पुलिस तंत्र पर बढ़ते बोझ में भी कमी आई है। प्रदेश के विभिन्न जनपदों में स्थापित परिवार परामर्श केंद्रों और थ्क्त्ब् इकाइयों ने सैकड़ों मामलों में सुलह, पुनर्मिलन और शांतिपूर्ण समाधान सुनिश्चित किया है।अध्यक्ष महोदया ने कहा कि इन क्लिनिकों में पुलिस अधिकारी, प्रशिक्षित काउंसलर, सामाजिक कार्यकर्ता और आवश्यकतानुसार विधिक विशेषज्ञों की सहभागिता से बहु-विषयक टीम काम करती है। इससे मामलों का निष्पक्ष, गोपनीय और दबाव-मुक्त समाधान संभव होता है। विशेष रूप से महिला पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति से महिलाओं को अपनी बात निर्भीकता से रखने का सुरक्षित वातावरण मिलता है।श्रीमती बबिता सिंह चौहान ने यह भी स्पष्ट किया कि जहाँ परामर्श और मध्यस्थता से समाधान संभव नहीं होता या गंभीर अपराध के तथ्य सामने आते हैं, वहाँ कानून के अनुसार कठोर और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाती है। महिला आयोग इस बात पर विशेष रूप से सजग है कि किसी भी स्थिति में महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों के अधिकारों से समझौता न हो।अध्यक्ष महोदया ने स्वीकार किया कि प्रशिक्षित काउंसलरों की कमी, सामाजिक दबाव और जागरूकता का अभाव जैसी चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं। इनसे निपटने के लिए उन्होंने पुलिस, महिला आयोग, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों के बीच समन्वित सहयोग, निरंतर प्रशिक्षण कार्यक्रम, जन-जागरूकता अभियान तथा मनोवैज्ञानिक एवं कानूनी सहायता के विस्तार की आवश्यकता पर बल दिया।
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