अशोक प्रवृद्ध
बिहार का वैशाली (लिच्छवी गणराज्य) विश्व का पहला सफल गणतंत्र माना जाता है। जब यूनान में नगर-राज्यों की अवधारणा आकार ले रही थी, उससे बहुत पहले भारत में पूरी तरह विकसित गणतांत्रिक व्यवस्थाएँ मौजूद थीं।ज् ऋग्वेद में 40 बार और अथर्ववेद में 9 बार ‘गणÓ शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि हमारे पूर्वज संख्या-बल और सामूहिक निर्णय की शक्ति को भली-भांति समझते थे। प्राचीन काल की सभा और समिति इस बात का प्रमाण हैं कि प्रजातंत्र के ये दो महत्वपूर्ण स्तंभ उस समय भी सक्रिय थे।
गौरव की बात है कि भारत में गणतंत्र की अवधारणा केवल 1950 से शुरू नहीं होती, बल्कि इसकी जड़ें हमारी प्राचीन सभ्यता, वैदिक संस्कृति और इतिहास में बहुत गहराई तक फैली हुई हैं। पूरे विश्व को गणतंत्र का पाठ सबसे पहले इसी धरती से मिला। हमारे ही देश में सर्वप्रथम गणतंत्र स्थापित हुआ, जिसकी सफलता ने संसार का ध्यान अपनी ओर खींचा। ऋग्वेद और अथर्ववेद में गण, सभा और समिति जैसी संस्थाओं का उल्लेख मिलता है, जो लोकतांत्रिक ढंग से निर्णय लेती थीं। ‘गणÓ शब्द का अर्थ ही जनता का समूह है, जहाँ शासक का चयन योग्यता के आधार पर होता था।
इतिहास के प्रमाण बताते हैं कि बिहार का वैशाली (लिच्छवी गणराज्य) विश्व का पहला सफल गणतंत्र माना जाता है। जब यूनान में नगर-राज्यों की अवधारणा आकार ले रही थी, उससे बहुत पहले भारत में पूरी तरह विकसित गणतांत्रिक व्यवस्थाएँ मौजूद थीं। असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और भारत विभाजन की पीड़ा के बाद 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ हमारा संविधान आधुनिक भले ही हो, लेकिन उसकी आत्मा में ‘वसुधैव कुटुंबकम्Ó और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:Ó जैसी प्राचीन भारतीय भावनाएँ समाई हुई हैं। संविधान निर्माताओं ने पश्चिमी मॉडलों के साथ-साथ भारत की अपनी सांस्कृतिक विरासत और पंचायत परंपरा को भी महत्व दिया।
यह दिन केवल संविधान के लागू होने का उत्सव नहीं है, बल्कि उन अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करने का अवसर भी है, जिन्होंने एक स्वतंत्र और संप्रभु भारत का सपना देखा था। 26 जनवरी का यह राष्ट्रीय पर्व हमें याद दिलाता है कि हम एक ऐसी महान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं, जिसने दुनिया को लोकतंत्र की दिशा दिखाई। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित गणतांत्रिक व्यवस्थाएँ यह सिद्ध करती हैं कि भारत में लोकतंत्र कोई आयातित विचार नहीं, बल्कि हमारी अपनी मिट्टी और वेदों की मौलिक देन है। यह भी सच है कि संविधान निर्माताओं ने इस व्यवस्था की प्रेरणा पवित्र वेदवाणी से ही ली।
यह भारतीय गणतांत्रिक परंपरा की ऐतिहासिक जड़ों को उजागर करता है और साबित करता है कि लोकतंत्र और गणतंत्र की अवधारणाएँ भारत में सहस्राब्दियों पहले से मौजूद थीं। संसार के आदिग्रंथ ऋग्वेद में 40 बार और अथर्ववेद में 9 बार ‘गणÓ शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि हमारे पूर्वज संख्या-बल और सामूहिक निर्णय की शक्ति को भली-भांति समझते थे। प्राचीन काल की सभा और समिति इस बात का प्रमाण हैं कि प्रजातंत्र के ये दो महत्वपूर्ण स्तंभ उस समय भी सक्रिय थे। समिति आज की संसद या लोकसभा जैसी थी, जहाँ जनता और प्रतिनिधि नीति-निर्धारण के लिए एकत्र होते थे, जबकि सभा राज्यसभा या विद्वत परिषद की तरह कार्य करती थी, जहाँ अनुभवी लोग परामर्श और न्याय का दायित्व निभाते थे।
ऋग्वेद का वह मंत्र, जिसमें एकमत होकर निर्णय लेने की प्रार्थना की गई है, आधुनिक आम-सहमति के सिद्धांत का प्राचीनतम रूप माना जा सकता है। बौद्ध ग्रंथों में भगवान बुद्ध के समय शलाका अर्थात मतपत्र द्वारा मतगणना का उल्लेख मिलता है, जो यह स्पष्ट करता है कि भारत में मतदान की प्रक्रिया अत्यंत विकसित थी। गण और संघ के माध्यम से बहुमत के आधार पर निर्णय लेना हमारी प्रशासनिक कुशलता का प्रतीक था। बाद में कुछ कारणों से व्यवस्था राजतंत्र की ओर मुड़ गई, लेकिन भारत की मूल चेतना हमेशा गणतांत्रिक बनी रही।
आज की पीढ़ी के लिए यह प्राचीन भारतीय गणतांत्रिक व्यवस्था अत्यंत प्रेरक है, क्योंकि अक्सर यह मान लिया जाता है कि लोकतंत्र पश्चिम की देन है। वास्तव में गण से गणतंत्र तक की यात्रा भारत की अपनी यात्रा है। इससे हम 26 जनवरी के वास्तविक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व को समझ सकते हैं। भारत के प्राचीन राजनीतिक इतिहास और विकसित संवैधानिक ढाँचे यह सिद्ध करते हैं कि आज के युग में भी हमारे लोकतंत्र की सफलता के पीछे सहस्राब्दियों पुरानी सुव्यवस्थित शासन परंपरा है।
संसदीय शब्दावली की प्राचीनता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि आज जिसे ‘कोरमÓ कहा जाता है, उसे प्राचीन काल में ‘गणपूरकÓ कहा जाता था। इसका अर्थ था कि न्यूनतम सदस्यों की उपस्थिति के बिना सभा मान्य नहीं होगी। सचेतक अर्थात ‘व्हिपÓ की अवधारणा भी तब मौजूद थी, जिससे अनुशासन बना रहता था। महर्षि पाणिनि द्वारा वर्णित वृक, यौधेय और त्रिगर्त जैसे गणराज्य प्राचीन भारत के संघीय ढाँचे के सशक्त उदाहरण हैं। महाभारत में वर्णित अंधक-वृष्णि संघ, जिसके प्रमुख श्रीकृष्ण थे, एक उन्नत गणतंत्रीय संघीय व्यवस्था का प्रतीक है।
महाभारत यह भी बताता है कि जनसभा में प्रत्येक सदस्य को अपनी बात रखने का अधिकार था, जो आज की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रारंभिक रूप है। अध्यक्ष का चुनाव जनता द्वारा किया जाना यह सिद्ध करता है कि सत्ता वंशानुगत नहीं, बल्कि योग्यता और जन-सहमति पर आधारित थी। कौटिल्य द्वारा लिच्छवी, वृज्जि और कम्बोज जैसे गणराज्यों का उल्लेख यह दर्शाता है कि मौर्य काल तक भी ये गणराज्य प्रभावशाली थे। पाणिनि की अष्टाध्यायी में ‘जनपदÓ शब्द जनता की सर्वोच्चता को रेखांकित करता है।
स्पष्ट है कि भारत में गणतंत्र केवल एक शासन-व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवन-शैली थी। 26 जनवरी 1950 को संविधान अपनाना वास्तव में उसी वैदिक, महाभारतकालीन और मौर्यकालीन लोकतांत्रिक चेतना का आधुनिक पुनर्जागरण था। वैशाली और लिच्छवी जैसे उदाहरण यह प्रमाणित करते हैं कि भारत वास्तव में लोकतंत्र की जननी है। इसलिए 26 जनवरी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों की इस गणतांत्रिक यात्रा के सम्मान का दिन है, जिसे समझना और सहेजना आज और भी अधिक आवश्यक है।
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