हरिशंकर व्यास
पूरी दुनिया की भू राजनीति में उथलपुथल है। पिछले आठ दशक से ज्यादा समय से अमेरिका के सबसे भरोसे के सहयोगी रहे यूरोपीय देशों का भरोसा टूटा है तो चीन और रूस जैसे अमेरिका के घोषित प्रतिद्वंद्वियों या दुश्मनों को भी नए सिरे से अपनी नीतियां बनाने की जरुरत महसूस हो रही है। ट्रंप भले दावा करें कि उन्होंने आठ युद्ध रुकवाए हैं, हकीकत यह है कि उन्होंने सात युद्ध शुरू किए हैं। सीरिया से लेकर लीबिया, नाइजीरिया, वेनेजुएला, ईरान तक अमेरिका ने बमबारी की है। उन्होंने कनाडा, वेनेजुएला और ग्रीनलैंड को अमेरिका के नक्शे का हिस्सा बता दिया है। दुनिया में इस समय युद्ध का खतरा मंडरा रहा है तो साथ साथ आर्थिक अनिश्चिततता भी गहरी होती जा रही है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया भर के देशों के खिलाफ टैरिफ वार छेड़ा है। भारत के ऊपर भी 25 फीसदी जैसे को तैसा टैक्स और रूस से तेल खरीदने के वजह से 25 फीसदी का जुर्माना टैक्स लगाया है। इसके बावजूद दुनिया की भू राजनीतिक और वैश्विक व्यापार की हालत ने भारत के लिए बड़ा मौका बनाया है। ट्रंप की नीतियों से परेशान दुनिया के ज्यादातर देश भारत की ओर से देख रहे हैं। इसलिए नहीं कि भारत उनको कोई राहत दिला देगा। सबको पता है कि भारत ग्लोबल वर्ल्ड ऑर्डर में कहीं नहीं है। लेकिन 140 करोड़ से ज्यादा लोगों का बाजार होने की वजह से भारत की स्थिति सबसे लिए महत्वपूर्ण हो गई है।
दुनिया भर के देशों को भारत में अपना सामान बेचना है। इसलिए दुनिया के सारे मुल्क भारत के साथ व्यापार समझौता करने को व्याकुल हैं। ब्रिटेन के साथ भारत की व्यापार संधि हो गई है। पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति अल नाह्यान भारत के दौरे पर आए तो दोनों देशों ने साझा व्यापार 25 लाख करोड़ रुपए तक ले जाने का समझौता है। वैसे अब भी यूएई के साथ भारत का कारोबार साढ़े 12 लाख करोड़ रुपए का है।
यूरोपीय संघ के साथ भारत की मुक्त व्यापार संधि की सारी शर्तें तय हो गई हैं। अब इस संधि पर दस्तखत होने हैं। इस साल गणतंत्र दिवस के मौके पर यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लियेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष भारत के मेहमान होंगे। 26 जनवरी की परेड के अगले दिन 27 जनवरी को यूरोपीय संघ के साथ अंतिम वार्ता होगी और व्यापार संधि हो जाएगी। इसे उर्सुला वॉन डेर ने मदर ऑफ ऑल डील्स कहा है। जाहिर है कि यह संधि बहुत बड़ी होगी और एक साथ यूरोप के 27 देशों के साथ भारत के आसान शर्तों पर व्यापार करने की स्थितियां बनेंगी।
लेकिन सवाल है कि इतने देशों के साथ आसान शर्तों पर व्यापार की संधियों से भारत को क्या हासिल होगा?
दुनिया के देशों को तो भारत का बाजार मिलेगा लेकिन भारत भी क्या उन देशों के बाजार में अपना कुछ बेच पाएगा? भारत के पास बेचने के लिए क्या है और जो है उसका बाजार कितना बड़ा है? असल में भारत ने अपने को निर्यातक बनाने की ठीक ढंग से तैयारी ही नहीं ही। अगर आप बारीकी से देखेंगे तो भारत आज भी वही चीजें दुनिया को बेचता हुआ है, जो ढाई हजार साल पहले मौर्य काल में भी भारत बेचता था। जब सिल्क रूट से कारोबार होता था तब भी भारत वही सामान बेचता था, जो आज बेचता है। वही कपड़े, वही रत्न, वही मसाले भारत तब भी बेचता था और आज भी बेचता है। इसमें थोड़ी बहुत और चीजें जरूर जुड़ी हैं लेकिन ऐसी नहीं हैं, जिससे भारत एक बड़ा निर्यातक देश बन जाए। 180 साल पहले गिरमिटिया मजदूर बाहर गन्ने के खेतों में काम करने के लिए गए थे और आज आईटी के पेशेवर कुलीगिरी करने के लिए दुनिया भर के देशों मे जाते हैं।
सो दुनिया के देशों के साथ हो रही व्यापार संधियों के बीच बड़ा सवाल यह है कि भारत में विनिर्माण क्रांति कैसे हो और भारत किन चीजों का उत्पादन बढ़ाए, जिसका वैश्विक बाजार बन सकता है और भारत में विदेशी मुद्रा का प्रवाह तेज हो? यह सवाल इसलिए है क्योंकि भारत में निवेशक नहीं आ रहे हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का पिछले चार महीने का आंकड़ा शुक्रवार, 23 जनवरी को छपा है। इसके मुताबिक नेट एफडीआई शून्य रहा है, पिछले चार महीनों में। इसका मतलब है कि जितना प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भारत में आया उससे ज्यादा भारत का पैसा निवेश होने के लिए विदेश गया। सो, नेट एफडीआई जीरो है। भारत का निर्यात का बिल हमेशा आयात बिल के मुकाबले बहुत कम होता है।
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