डॉ. विभा धवन
पिछले लगभग दो दशकों से ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम भारत की सामाजिक सुरक्षा संरचना का केंद्रीय स्तंभ रहे हैं। वर्ष 2005 में अधिनियमित महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमजीएनआरईजीए) ने ग्रामीण परिवारों को आय सुरक्षा प्रदान की है, कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी का विस्तार किया है तथा आवश्यक सामुदायिक परिसंपत्तियों के सृजन में योगदान दिया है। जैसे-जैसे ग्रामीण भारत तीव्र आर्थिक, प्रौद्योगिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों से गुजर रहा है, उभरती चुनौतियों और अवसरों का प्रभावी ढंग से उत्तर देने के लिए इस ढांचे को और अधिक सुदृढ़ करने की तात्कालिक आवश्यकता है।
विकसित भारत-रोजग़ार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी अधिनियम, 2025 इस क्रमिक विकास को प्रतिबिंबित करता है। ग्रामीण रोजगार गारंटी ढांचे में सुधार के माध्यम से यह अधिनियम इस तथ्य को मान्यता देता है कि सतत् ग्रामीण समृद्धि केवल रोजगार सृजन पर ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, जलवायु जोखिमों के प्रति लचीलेपन तथा आजीविकाओं के संरक्षण पर भी आधारित होनी चाहिए। यह समेकित दृष्टिकोण ऐसे समय में अत्यंत प्रासंगिक है, जब ग्रामीण समुदाय जलवायु परिवर्तनशीलता, चरम मौसमीय घटनाओं और संसाधन दबाव के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता का सामना कर रहे हैं।
जी राम जी अधिनियम क्यों विशिष्ट है
जी राम जी अधिनियम की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें मजदूरी आधारित रोजगार को चार प्राथमिक क्षेत्रों के साथ संरेखित करने पर विशेष बल दिया गया है—जल सुरक्षा, मूल ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से संबंधित अवसंरचना तथा चरम मौसमीय घटनाओं के शमन से जुड़े कार्य। यह ग्रामीण रोजगार नीति के पर्यावरणीय और लचीलापन संबंधी आयामों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
जल से संबंधित कार्य, मृदा एवं भूमि संरक्षण, जल निकासी प्रणालियाँ तथा जलवायु-अनुकूल अवसंरचना कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के साथ-साथ बाढ़, सूखा और भूमि क्षरण के प्रति संवेदनशीलता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब ऐसी परिसंपत्तियां प्रभावी ढंग से नियोजित तथा कार्यान्वित की जाती हैं, तो वे कई लाभ उत्पन्न करती हैं—अल्पकालिक रोजगार सृजन, प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन तथा दीर्घकालिक आजीविका सुरक्षा। इन क्षेत्रों पर अधिनियम का विशेष बल इस तथ्य को रेखांकित करता है कि रोजगार कार्यक्रम एक साथ सामाजिक संरक्षण और जलवायु अनुकूलन के प्रभावी साधन के रूप में कार्य कर सकते हैं।
स्थानीय स्तर पर लचीलापन
अधिनियम की नियोजन पारिस्थितिकी—जिसका केंद्र विकसित ग्राम पंचायत योजनाएँ हैं तथा जिसमें परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक के अंतर्गत एकीकृत किया गया है—ग्रामीण विकास के लिए एक सुसंगत और भविष्य के लिए तैयार दृष्टिकोण को समर्थन प्रदान करती है। विकेन्द्रीकृत नियोजन के माध्यम से पंचायतों को स्थानीय प्राथमिकताओं की पहचान करने का अवसर मिलता है, जबकि राष्ट्रीय प्लेटफार्मों के साथ एकीकरण व्यापक अवसंरचना एवं विकास उद्देश्यों के साथ समन्वय सुनिश्चित करता है।
कार्यान्वयन के दृष्टिकोण से यह ढांचा रोजगार गारंटी के अंतर्गत सृजित परिसंपत्तियों की गुणवत्ता, स्थायित्व और प्रासंगिकता में सुधार का अवसर प्रदान करता है। पर्याप्त तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण के माध्यम से पंचायती राज संस्थान यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं कि सार्वजनिक कार्य, संसाधन संरक्षण तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण में सार्थक योगदान दें। अधिनियम के अंतर्गत परिकल्पित पारदर्शिता तंत्र, डिजिटल निगरानी उपकरण और सामाजिक अंकेक्षण जवाबदेही को और सुदृढ़ करते हैं तथा सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहित करते हैं।
सामाजिक संरक्षण और लचीलेपन पर ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (टेरी)
सतत् विकास के प्रति वचनबद्ध एक शोध संस्थान के रूप में, टेरी ने यह समझने के लिए व्यापक रूप से कार्य किया है कि ग्रामीण समुदायों में लचीलापन विकसित करने के लिए सामाजिक संरक्षण तंत्रों को किस प्रकार सुदृढ़ किया जा सकता है। हमारे शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि जब रोजगार कार्यक्रमों को पर्यावरणीय योजना और जोखिम-सूचित रूपरेखा के साथ जोड़ा जाता है, तो वे घरेलू तथा सामुदायिक—दोनों स्तरों पर अनुकूलन क्षमता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकते हैं।
टेरी ने जलवायु लचीलापन, पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन तथा आजीविका की निरन्तरता को सम्मिलित करने हेतु नीतिगत ढांचों के पुनरोद्धार और सुदृढ़ीकरण से संबंधित सरकारी प्रक्रियाओं में विश्लेषणात्मक योगदान प्रदान किया है। इसमें कार्यक्रम अभिकल्पना में लचीलापन संबंधी पहलुओं के एकीकरण को समर्थन देना तथा रोजगार सृजन के साथ-साथ दीर्घकालिक पर्यावरणीय और सामाजिक परिणामों को प्रतिबिंबित करने वाले संकेतकों की पहचान करना शामिल है।
इसके अतिरिक्त, टेरी ने ऐसे वित्तीय मॉडल और नियोजन दृष्टिकोणों का अध्ययन किया है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश को अधिकतम करने में मदद कर सकते हैं — सामुदायिक परिसंपत्तियों को सुदृढ़ करना, दीर्घकालिक संवेदनशीलता को कम करना, और संसाधनों के उपयोग की दक्षता बढ़ाना। इस प्रकार के शोध-आधारित योगदान का उद्देश्य सरकारी पहलों का पूरक होना और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण का समर्थन करना होता है।
आजीविकाओं का संरक्षण
जी राम जी अधिनियम का दृष्टिकोण ग्रामीण आजीविकाओं को बनाए रखने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के महत्व को प्रमुखता देता है। जल सुरक्षा, कनेक्टिविटी, भंडारण और जलवायु-सहनशील अवसंरचना में निवेश प्रत्यक्ष रूप से कृषि, सहायक गतिविधियों और गैर-कृषि आजीविकाओं का समर्थन करता है। साथ ही, अधिनियम में शामिल प्रावधान, जैसे कि प्रमुख कृषि सीजऩ के दौरान सार्वजनिक कार्यों में राज्य-निर्धारित विराम, यह सुनिश्चित करने में मदद करते हैं कि रोजगार सृजन कृषि गतिविधियों के पूरक के रूप में बना रहे।
एक कानूनी रोजगार गारंटी की निरंतरता, साथ ही जहाँ कार्य प्रदान नहीं किया जाता वहां बेरोजगारी भत्ता देने के प्रावधान, अधिनियम के सामाजिक संरक्षण उद्देश्यों को और मजबूत करते हैं। पूर्वानुमेय नियोजन और वित्तपोषण के साथ, प्रशासनिक क्षमता के सुदृढ़ीकरण के माध्यम से, कार्यक्रम की प्रभावशीलता और प्रतिक्रिया देने की क्षमता को और बढ़ाया जा सकता है।
‘विकसित भारत 2047Ó की ओर
जैसे-जैसे भारत विकसित भारत 2047 के विजऩ की ओर बढ़ रहा है, ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम समावेशी विकास प्रदान करने में एक बड़ी रणनीतिक भूमिका निभाएंगे। उनकी सफलता का मूल्यांकन केवल सृजित कार्यदिवसों की संख्या से नहीं, बल्कि लचीली आजीविकाओं, स्थायी अवसंरचना और महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में उनके योगदान से किया जाएगा।
इस संदर्भ में, विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम, 2025 इन परिणामों को प्राप्त करने के लिए एक मजबूत नीतिगत ढांचा प्रस्तुत करता है। पर्यावरणीय प्राथमिकताओं को सम्मिलित करके, जलवायु जोखिमों के प्रति लचीलापन बढ़ाकर और विकेन्द्रीकृत नियोजन को मजबूत करके यह अधिनियम ग्रामीण रोजगार को सतत् विकास की आधारशिला के रूप में स्थापित करता है। सरकार, शोध संस्थानों, राज्यों और स्थानीय समुदायों के बीच निरंतर सहयोग के माध्यम से यह सुधार यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है कि ग्रामीण रोजगार वर्तमान आवश्यकताओं के साथ-साथ भविष्य हेतु लचीलेपन में भी सार्थक योगदान दे—आज आजीविकाओं का समर्थन करते हुए कल की समृद्धि के लिए आवश्यक संसाधनों की रक्षा करना।
(लेखिका: महानिदेशक, ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (टेरी))
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