डॉ. सुधीर सक्सेना
वह कुलीन यहूदी परिवार में जन्मा था। पिता नगर के धनाढ्य और गणमान्य व्यक्ति थे। वह कुल चार भाई-बहन थे। वह कुशाग्र बुद्धि था और उसमें बचपन से ही कुछ नया और अलहदा कर गुजरने की तड़प थी। पिता चाहते थे कि बेटा उनके नक्शे-पा चले, लेकिन पूत के पाँव पालने में देख उन्होंने उसकी इच्छापूर्ति में बाधा नहीं डाली।
पूरा नाम फ्रिट्ज जैकब हाबर। जन्म हुआ 9 दिसंबर, सन 1868 को उत्तरी जर्मन परिसंघ के प्रूशिया साम्राज्य के सिलेसिया प्रांत में ब्रेस्लाऊ में व्यापारिक घराने में। हैबर-परिवार ब्रेस्लाऊ के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित परिवारों में एक था। पिता सिग्फ्राइड और माँ पौला की दो ही संतानें थीं : पुत्र फ्रिट्ज और पुत्री एल्सी। पुत्र फ्रिट्ज बड़ा होकर सफल और विख्यात वैज्ञानिक बना। अपार शोहरत। अपार धन। वह गजब का कीमियागर था। फलत: उसे सन 1918 में रसायन-विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला। हैबर-बॉश प्रक्रिया के लिए इस पुरस्कार मिला। उसे हैबर-बॉश प्रक्रिया के लिए इस पुरस्कार से नवाजा गया। यह प्रक्रिया रसायन-उद्योग में नाइट्रोजन और हाइड्रोजन गैस से अमोनिया के संश्लेषण में प्रयुक्त विधि है। मार्के की बात यह है कि हैबर ने अपने आविष्कार से फसलों और युद्ध का नक्शा बदल दिया। एक ओर जहां उसकी ईजाद से अन्न उत्पादन में कई गुना इजाफा हुआ, वहीं उसका आविष्कार युद्ध के मोर्चे पर फतह और अनगिन मौतों का बायस बना। उसकी वैज्ञानिक विरासत खेलों में विपुल उत्पादन से करोड़ों लोगों को भोजन मुहैया करने तक ही नहीं फैली है, बल्कि वह लाखों निर्दोषों और निरपराधों की गैस चैंबरों में मौत के जघन्य पाप तक फैली हुई है।
फ्रिटज हाबर की जीवन गाथा में नेकी और बदी की चरम इच्छाओं के उजले और स्याह धागे आपस में भी संशिलष्ट है। उसका वैवाहिक जीवन अशांति और अनहोनी से बिंधा रहा और उसका अंत एकाकीपन में वतन से दूर हुआ। यही नहीं, उसने लानतें झेलीं और तिरस्कार भी। वह हिटलर का प्रशंसक और भक्त था तथा स्वयं को गर्व से राष्ट्रवादी जर्मन कहता था। उसने यहूदी धर्म का परित्याग कर बपतिस्मा भी ले लिया था, लेकिन नाजियों ने उसे अपना नहीं माना। विवश होकर उसे जर्मनी छोडऩा पड़ा। यही नहीं, उसने घातक रसायनों के जरिये मौत का जो खतरनाक खेल ईजाद किया था, उसकी नृशंस और वीभत्स परिणति भयावह होलोकास्ट में हुई। नाजियों ने गैस चैंबरों के जरिये लाखों यहूदियों को निर्दयतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया।
विश्व इतिहास में चुनिंदा वैज्ञानिकों में शुमार फ्रिट्ज हाबर को केमिकल वारफेयर (रासायनिक युद्ध कर्म) के जनक के तौर पर याद किया जाता है। फ्रिट्ज के पिता का रंग-रोगन, दवा और रंगाई का कारखाना था और वह चाहते थे कि बेटा उनका कारोबार संभाले, लेकिन बेटा कीमियागर बनने को आतुर था। परिवार कर्मकांडी न होकर भी यहूदी था, लिहाजा जोहानियम स्कूल में प्राथमिक शिक्षा के बाद वह जिस सेंट एलिजाबेथ स्कूल में भर्ती हुआ, वहां प्रोटेस्टैंटों और यहूदियों के लिए पृथक कक्षाओं की व्यवस्था थी। परिवार व अन्य यहूदियों के विपरीत फ्रिट्ज स्वयं को सगर्व जर्मन दर्शाता था। वहां से निकलने पर पिता ने उसकी इच्छानुरूप उसे रसायन विज्ञान पढऩे के लिए बर्लिन स्थित फ्रैड्रिख विल्हेम यूनिवर्सिटी में भेज दिया। पहले सेमिस्टर की हताशा उसे सन 1887 की ग्रीष्म में हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय ले गयी, जहां उसे राबर्ट बुन्सेन ने पढ़ाया। वहां से वह बर्लिन लौटकर टेक्नीशे होष्शूले शार्लोटेन्बर्ग में भर्ती हुआ। सन 1889 में सैन्य नोंदणी के बाद वह छठवीं फील्ट आर्टिलरी रेजीमेंट में एक वर्ष की वालंटियर सेवा में भर्ती हो गया। एक साल बाद वह शार्लोटेन्बर्ग लौटा और कार्ल लीबरमान का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया। कार्ल के कार्बनिक रसायन के लेक्चरों के साथ-साथ वह रंगों की रसायन प्रौद्योगिकी पर आटो बिट्ट के लेक्चर भी अटेन्ड करता था। लीबरमैन द्वारा प्रदत्त विषय पर गहन शोध के फलस्वरूप उसे मई, 1891 में यूनिवर्सिटी ऑफ बर्लिन से डॉक्टरेट की उपाधि मिल गयी।
इस तरह रसायनज्ञ होकर फ्रिट्ज घर लौट आया, किंतु घर में सब सुकर न था। पिता और उनके रिश्तों में खटास थी और इसकी खासी वजह थी। हुआ यह कि फ्रिट्ज के जन्म पर पौला को प्रसव में परेशानी हुई। फलत: तीन हफ्ते बाद उसने प्राण त्याग दिये। मातृहीन फ्रिट्ज को चाचियों ने पाला। फ्रिट्ज जब छह वर्ष का हुआ, उसके व्यथित पिता ने दूसरी शादी कर ली। हेडविग हैम्बरर्गर से उसे तीन बेटियां हुईं। फ्रिटज का जन्म और पत्नी की मौत का संदर्भ सिग्फ्राईड कभी भुला नहीं सके। फ्रिट्ज ने विमाता और बहनों से किसी तरह पटरी बिठाये रखी। रिश्ते कैसे भी रहे हों, उसे पिता के रसूख का खूब लाभ मिला। उनकी बदौलत उसे बड़े कारखानों और आसवनी में काम का मौका मिला। पिता की मनुहार कर वह एक सेमेस्टर के लिए ज्यूरिख के पॉलीटेक्नीक कॉलेज में जार्ज लुंग के साथ अध्ययन हेतु भर्ती हो गया। वहां से लौटकर पिता के काम में हाथ बँटाने वह ब्रेस्लाऊ लौटा, लेकिन पिता-पुत्र के रिश्तों में बल पड़ते गये। पिता को पुत्र का प्राकृतिक के बजाय कृत्रिम रंगों के इस्तेमाल का सुझाव फला, किंतु हैजे की महामारी पर थोक में कैल्शियम हाइपोक्लोराइट खरीदने से हुये नुकसान से पुत्र को पिता ने घर से रूख्सत कर दिया।
पिता से विच्छेद के बाद उसकी नयी पारी शुरू हुई। वह स्वयं को यहूदी कम, जर्मन अधिक मानता था। सन 1892-94 के दरम्यान वह जेना विश्वविद्यालय में लुडविग नॉर का सहायक रहा। इसी दरम्यान वह यहूदी से ईसाइयत के लूथर संप्रदाय में दीक्षित हुआ। मकसद था बेहतर करियर। लुडविग ने उसकी सिफारिश काल्सरूहे विश्वविद्यालय में कार्ल एंग्लर से की और कार्ल ने हैंस बुन्हे से, जिसने उसे अपना सहायक बना लिया। वहीं उसने हाइड्रोकार्बनों की पुनर्वास थीसिस प्रस्तुत की। इस पर उसे अध्ययन का दायित्व मिला और संस्थान ने रंगरेजी की प्रौद्योगिकी के अध्ययन हेतु उसे बाहर भेजा। विद्युत रासायनिकी के उच्च अध्ययन और शोध के लिये वह एक बार फिर बाहर गया। अध्ययन और अनुसंधान तथा ख्याति का यह क्रम चलता रहा। वह असोशियेट प्रोफेसर बना और ग्रांड ड्यूक फ्रेडरिख वॉन बाडेन ने उसे एक्स्ट्राऑर्डिनेरियस से विभूषित किया। जल्द ही वह कार्ल्सरूहे में भौतिक रसायन का प्रोफेसर बन गया। सन 1894 से सन 1911 के दरम्यान लगातार प्रयोगों के बाद उसने उच्च दाब और ताप से अमोनिया के उत्प्रेरकीय-निर्माण में सफलता अर्जित की, जिससे सन 1894 में प्रस्तुत ली शतेलिये के सिद्धांत पुष्टि हुई। अमोनिया के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उसने बास्फ के कार्ल बाश से भागीदारी की। नतीजा सार्थक रहा। औद्योगिक रसायन में हाबर-बॉश प्रक्रिया मील का पत्थर मानी गई। अब तक कृषि उत्पादन प्राकृतिक अमोनिया पर निर्भर था, कृत्रिम अमोनिया के उत्पादन ने उर्वरक-परिदृश्य को बदल दिया। अन्न उत्पादन में क्रांति हुई। अनुमान है कि इससे विश्व की आधी आबादी को भूख से निजात मिली। आज संश्लेषित नत्रजन-उर्वरकों का उत्पादन 100 मिलियन टन से ज्यादा है। विश्व की आधी से अधिक आबादी के लिए अन्न उत्पादन इन्हीं उर्वरकों पर अवलंबित है और यह हाबर-बॉश प्रक्रिया से संभव हो सका है।
यह है हाबर के व्यक्तित्व का सकारात्मक पहलू, लेकिन उसके व्यक्तित्व का एक और विलोम पहलू भी है। इसी की बदौलत उसे रासायनिक युद्धकर्म का जनक कहा जाता है। फ्रिटज को प्रथम विश्वयुद्ध में क्लोरीन और जहरीला गैसों को आयुध के तौर पर इस्तेमाल का श्रेय जाता है। उसने पहले पहल वायु से गुरू (भारी) क्लोरीन का लाम पर उपयोग की पहल की। यप्रेस की दूसरी जंग में फ्रेंच और अल्जीरियाई सैनिकों ने खंदकों का अलंध्य मोर्चा बांध रखा था। जर्मन फौजों ने क्लोरीन के गोले छोड़कर दुश्मन को मात दे दी। भारी क्लोरीन से खंदकें ढंक गयी और फौजियों का दम घुट गया। फ्रिट्ज के इस हथियार का दुश्मन के पास कोई जवाब नहीं था। यह मत सोचिये कि विश्वयुद्ध में यह वैज्ञानिक प्रयोगशाला तक सीमित रहा। प्रथम विश्वयुद्ध छिडऩे पर उत्साहपूरित फ्रिट्ज अक्टूबर, 1914 में उस मैनीफेस्टो पर दस्तखत करने वाले 92 जर्मन बुद्धिजीवियों में एक था, जिसने स्कूलों और कॉलेजों में युद्धोन्माद पैदा किया। वह सन 1907 के हेग कन्वेंशन की रसायनों के युद्ध में उपयोग की वर्जनाओं को धता बताने वालों में अग्रणी था। लैब में बैठने के बजाय वह फौज में शरीक होकर मोर्चे पर जा पहुंचा और उसने रासायनिक हमले का उत्साहपूर्वक संचालन किया। मोर्चे पर फतहयाब होने पर उसे कैप्टेन के तौर पर प्रोन्नत कर युद्ध मंत्रालय में रसायन विभाग का मुखिया बना दिया गया। बेल्जियम में यप्रेस की जंग में उसकी संलिप्तता का आभास इससे लगाया जा सकता है कि मोर्चे पर मौजूदगी के अलावा उसने इस अभियान के लिए 150 से अधिक वैज्ञानिकों और 1300 तकनीशियनों का टोला तैयार किया। ओट्टो पीटरसन की कमान में गैस युद्ध के लिए जिन दो रेजीमेंटों की भर्ती हुई, उसके परामर्शदाता हाबर और आटो हान थे। यही नहीं, हाबर ने विशेष फिल्टरयुक्त मास्क बनाने में भी अहम भूमिका निभायी, जिनसे जहरीली गैसों से बचा जा सकता था। उसने वह हाबर नियम भी प्रतिपादित किया, जिसमें जहरीली गैसों की सांद्रता और उनकी मारक क्षमता व समय में गणितीय संबंध दर्शाया गया था। उसकी मान्यता थी कि शांति के समय वैज्ञानिक विश्व का होता है, लेकिन युद्ध के दौरान वह राष्ट्र का होता है। उसका कहना था कि मौत तो मौत है। विषाक्त गैसों की युद्ध में हिमायत करते हुए उसने लोहे के उड़ते टुकड़ों (गोलियों) के मुकाबले जहरीलों गैसों को कम निर्दय बताया। उसका तर्क था कि विषाक्त गैस से मृत्यु जल्द होती है और पीड़ा कम।
रसायन को मौत का परवाना बनाने का हाबर का खौफनाक खेल यहीं खत्म नहीं होता। उसके कीमिया ने रसायन से मौत का रास्ता खोल दिया। उसका काम जाइक्लोन बी कीटनाशक विकसित करने का आधार बना। इसका इस्तेमाल होलोकास्ट में हुआ। इससे गैस चैम्बरों में दूसरे विश्वयुद्ध में लाखों यहूदी मारे गये। हाबर की जहरीली सोच के साथ उसके दांपत्य-जीवन का त्रासद प्रसंग भी जुड़ा हुआ है। सन 1889 में हाबर की मुलाकात क्लारा इम्मवाहर से हुई, जो एक शक्कर कारखाने के मालिक रसायनज्ञ की बेटी थी। क्लारा ब्रेस्लाऊ विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में पीएचडी पहली महिला थी। उसने भी 1897 में बपतिस्मा ले लिया था। अगस्त, 1901 में हाबर और क्लारा भी शादी हुई और अगले ही वर्ष पुत्र हर्मन का जन्म हुआ।
शादी के करीब 14 साल बाद दो मई, 1915 की बात है कि क्लारा ने हाबर से बहस के बाद बगीचे में पति की रिवॉल्वर से खुद के सीने में गोली दाग ली। अनुमान है कि यह आत्महत्या पति-पत्नी के बीच तर्क-वितर्क और तकरार का नतीजा थी। क्लारा स्वयं रसायनज्ञ थी। वह शांतिप्रिय विदुषी महिला थी और उसे नरहसंहार के लिए रसायनों का उपयोग नापसंद था। यप्रेस की लड़ाई में हाबर की भूमिका क्लारा की हताशा बनी। फ्रिट्ज के क्लोरीन-आयुध से 67,000 से अधिक जने हताहत हुये थे। बहरहाल, फ्रिट्ज पर क्लारा की खुदकुशी का कोई असर नहीं पड़ा और वह अंत्येष्टि का जिम्मा औरों पर छोड़कर रूसी सेना के खिलाफ गैस-रिलीज की देखरेख के लिए पूर्वी मोर्चे को रवाना हो गया। उस पर जर्मन राष्ट्रवाद और युद्धोन्माद तारी था। क्लारा की मौत को दो ही साल बीते थे कि फ्रिट्ज ने बर्लिन में 25 अक्टूबर को शार्लोट नाथन नामक महिला से शादी कर ली। एक तो उम्र का अंतर और फिर विचारों का टकराव। फलत: 6 दिसंबर, 1927 को दोनों का तलाक हो गया।
प्रथम विश्वयुद्ध में गैसयुद्ध वस्तुत: दो रसायनज्ञों का मुकाबला भी था। फ्रिट्ज का मुकाबला फ्रेंच रसायनज्ञ विक्टर ग्रिग्नार्ड से था और दोनों ही नोबेले से नवाजे गये। बहरहाल, दूसरे विश्वयुद्ध से पहले रासायनिक हथियारों के लिए हाबर की तीखी आलोचना हुई उसके आलोचकों में अल्बर्ट आइंस्टीन भी थे। विश्वयुद्ध के बाद भी फ्रिट्ज रासायनिक हथियारों के विकास में संलग्न रहा। उसे जापानी व्यावसायी होशी हाजीमे के कैसर विल्हेम सोसायटी को दान में दिये दो मिलियन राइशमार्क के प्रबंधन का दायित्व सौंपा गया। प्रत्युक्तर में हाबर ने होशी की कंपनी को अनेक रासायनिक लाइसेंसों की पेशकश की, जिसे होशी ने ठुकरा दिया।
हाबर ने दहन अभिक्रिया, अधिशोषण प्रभाव और मुक्तमूलक अनुसंधान में उल्लेखनीय कार्य किये। उसने समुद्री जल से सोने के पृथककरण पर भी महत्वपूर्ण काम किया और पाया कि यह लाभकारी नहीं होगा। उसने ये शोध बर्लिन-डालहेम स्थित कैसर विल्हेम भौतिक रसायन एवं विद्युत रसायन संस्थान में किये सन 1953 में इस संस्थान का नामकरण उसके नाम पर किया गया।
संस्थान का पुनर्नामकरण तो फ्रिट्ज के देहांत के लगभग दो दशक बाद की बात है, नाजी दौर में अपने जर्मन राष्ट्रवादी होने से गर्वोन्नत्त नोबेल से नवाजे गये प्रतिभाशाली वैज्ञानिक को जीवन में बहुत कुछ भगतना पड़ा। जर्मनी में नाजीवाद के उफान ने हाबर को चिंता में डाल दिया। यह चिंता उसे अपने मित्रों, सहयोगियों और परिजनों की थी। हिटलर के जर्मन राष्ट्रवाद की रौ में कैसर विल्हेम सोसायटी के यहूदी वैज्ञानिक भी निशाने पर आ गये। एक जर्मन अखबार ने उन्हें बड़े मुनाफाखोर कोप्पेल का भतीजा बताकर यह तोहमत जड़ी कि वह संस्थान में यहूदियों की भरमार का जरिया है, जबकि हाबर को कोप्पेल से कोई वास्ता न था। लांछन से वह स्तब्ध रह गया। वह स्वयं कन्वर्टेड ईसाई था और उसने जर्मनी के लिये सब कुछ समर्पित किया था, लेकिन नाजियो ने उसे बख्शा नहीं, बल्कि सभी यहूदी कर्मियों की बर्खास्तगी का फर्मान जारी कर दिया। अब हाबर का ज्यू-डीएनए जागा। उसने अनुपालन में ढिलाई बरती कि वे सब मनमाफिक ठिकाना ढूंढ सकें। अंतत: उसने 30 अप्रैल, 1933 को अपना इस्तीफा इस दलील के साथ भेजा कि धर्मान्तरित होने से वह पद पर बने रहने के हकदार हो सकते हैं, लेकिन बात बनी नहीं। हाबर और हर्मन को जर्मनी छोडऩा पड़ा। उसके और शार्लोट के बच्चे 1933-34 में इंग्लैंड चले गये और ब्रिटिश नागरिक बन गये। अगस्त, 1933 में हाबर ने भी हताशा में डाहलेम छोड़ दिया और कुछ अर्सा पेरिस, स्पेन और स्विटजरलैंड में रहा। नियति अपना खेल खेल रही थी। युद्ध में जहरीली गैसों का प्रणेता फ्रांस और इंग्लैंड जाने को बाध्य था। मनोघात गहरा था। उसे एन्जाइना के दौरे पडऩे लगे। सेहत ने दगा दे दी। समवयस्क और समकक्ष वैज्ञानिकों ने उसकी जर्मनी छोडऩे में न सिर्फ मदद की, बल्कि हेरोल्ड हार्टले, सर विलियम जैक्सन पोप, फ्रेडरिक डोनन जैसे साइंसदांओं ने अधिकारिक तौर पर उसे कैंब्रिज में आमंत्रित करने की व्यवस्था की। हाबर अपने सहायक जोसेफ जोशुआ वीस के साथ कुछ माह वहां रहा और काम भी किया, लेकिन भीतर-बाहर सब कुछ सामान्य न था। कुछ वैज्ञानिकों की नजर में हाबर अपने कृत्यों से अक्षम्य पाप कर चुका था और पाप मोचन का कोई मार्ग न था। अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने इसी से उससे हाथ मिलाने से इंकार कर दिया। घड़ी के कांटे तेजी से घूम रहे थे। जर्मनी के दरवाजे उसके लिये बंद थे। उसकी राष्ट्रभक्ति नाजियों के लिये बेमानी थी। चैम बीजमैन सन 1933 में संक्षिप्त प्रवास पर इंग्लैंड आये तो उन्होंने फिलिस्तीन में रेहोवाट में सीफ रिसर्च इंस्टीट्यूट (अब वीजमैन इंस्टीट्यूट) में निदेशक का प्रस्ताव रखा। इसे स्वीकार कर हाबर अपनी सौतेली बहन एल्सी फेयहन के साथ मध्यपूर्व के लिए रवाना हुआ। उसकी सेहत लगातार बिगड़ रही थी। 29 जनवरी सन 1934 को सर्द मौसम में यात्रा के दौरान बेसल के एक होटल में उसका हृदयाघात से आकस्मिक निधन हो गया।
मृत्यु के समय फ्रिट्ज की आयु मात्र 65 वर्ष थी। यदि जर्मनी में नाजीवाद का अभ्युदय नहीं होता तो शायद वह दीर्घायु होता और उसने कुछ और आविष्कार किये होते। उसकी प्रतिभा कि उसे अमेरिका और सोवियत संघ ने पदकों से सम्मानित किया और इंग्लैंड जैसे शत्रु-राष्ट्र में उसे शरण मिली। बहरहाल, उसकी शोकांतिका के साथ कुछ क्षेपक भी जुड़े हुये हैं। उसकी इच्छानुसार उसके पुत्र हर्मन ने 29 सितंबर 1934 को उसके कफन-दफन की व्यवस्था की। क्लारा के अवशेषों को डालहेम में कब्र से निकालकर 27 जनवरी, 1937 को पुन: उसके साथ दफनाया गया। हाबर के परिवार के कई सदस्य नाजी यातना शिविरों में मारे गये। इनमें उसकी सौतेली बहन फ्रीडा की बेटी हिल्डे ग्लुक्समैन, उनके पति और उनके दो बच्चे शामिल थे। युद्धोपरांत मार्गरेट की मृत्यु हो गयी और उसके पति हरमन ने सन 1946 में और उनकी सबसे बड़ी बेटी क्लेयर, जो स्वयं रसायनज्ञ थी, सन 1949 में आत्महत्या कर ली। फ्रिट्ज का दूसरा बेटा लुडविग प्रख्यात ब्रिटिश अर्थशास्त्री और लेखक बना तथा बेटी इवा बरसों केन्या में रहकर 1950 में इंग्लैंड चली आईं। हाबर ने अपनी विशाल और कीमती लाइब्रेरी सीफ इंस्टीटयूट को दे दी थी। यह लाइब्रेरी अभी वीजमैन इंस्टीट्यूट में निजी संग्रह के तौर पर विद्यमान है। सन 1981 में मैक्स प्लैंक सोसायटी के मिनर्वा फाउंडेशन ने येरूशलम के हिब्रू विश्वविद्यालय के सहयोग से फ्रिट्ज हाबर आणविक गतिकी अनुसंधान केंद्र की स्थापना की। डालहेम के पूववर्ती कैसर विल्हेम संस्थान का नाम 1953 में बदलकर फ्रिट्ज हाबर संस्थान कर दिया गया। आइंस्टीन से उसके रिश्तों पर बर्न थियेसेन ने सन 2003 में आइंस्टीन का उपहार नाटक लिखा। बीबीसी ने उसके जीवन पर दो नाटक प्रसारित किये। बीबीसी ने सन 2013 में एक कार्यक्रम किया। विषय था दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों में से एक को क्यों भुला दिया गया? उसके मित्र रहे अल्बर्ट आइंस्टीन ने उसकी मौत पर कहा हाबर का जीवन एक जर्मन यहूदी की त्रासदी था; एकतरफ प्रेम की त्रासदी।
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