नई दिल्ली, 23 मार्च (आरएनएस)। देश की राजनीति में बड़ा उलटफेर तय माना जा रहा है। अगर सरकार की नई रणनीति पर मुहर लगती है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी का गवाह बनेगा। सीटें बढ़ेंगी, समीकरण बदलेंगे और संसद में महिलाओं की ताकत ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच सकती है।
महिला आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार ने अब तेज़ी से कदम बढ़ा दिए हैं। जानकारी के मुताबिक, सरकार 2029 से पहले ही महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान संशोधन की तैयारी में है। इसके तहत लोकसभा सीटों के परिसीमन का आधार 2011 की जनगणना को बनाने की योजना है, जिससे सीटों की संख्या में बड़ा इजाफा संभव है।
सूत्रों के अनुसार, मौजूदा 543 लोकसभा सीटें बढ़कर 816 तक पहुंच सकती हैं। इस नई संरचना में करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का खाका तैयार किया जा रहा है। यह बदलाव सीधे तौर पर संसद की संरचना और राजनीतिक ताकत के संतुलन को बदल देगा।
दरअसल, पहले पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम में यह प्रावधान था कि महिला आरक्षण नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा। लेकिन अब सरकार इस शर्त को बदलकर आरक्षण को जल्द लागू करने की दिशा में बढ़ रही है। इसके लिए नया संशोधन बिल लाया जा सकता है।
राजनीतिक स्तर पर भी हलचल तेज़ हो गई है। गृह मंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे पर कई दलों से बातचीत शुरू कर दी है। हालांकि अभी सभी बड़े विपक्षी दलों की सहमति नहीं बनी है, लेकिन सरकार इस पर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश में जुटी है।
अगर यह प्रस्ताव संसद से पास हो जाता है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव न केवल संख्या में बड़ा होगा, बल्कि प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी ऐतिहासिक बन जाएगा। महिलाओं की भागीदारी बढऩे से नीतियों, प्राथमिकताओं और राजनीतिक एजेंडा में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
यह कदम भारतीय लोकतंत्र की दिशा बदल सकता है। जहां एक ओर महिलाओं को निर्णायक भूमिका मिलेगी, वहीं राजनीतिक दलों के लिए नए समीकरण और चुनौतियां भी खड़ी होंगी। साफ है—अगर यह कानून लागू हुआ, तो 2029 सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि सत्ता के नए संतुलन की शुरुआत होगी।
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