वाशिंगटन/तेहरारन, 08 अपै्रल। अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने की हो, लेकिन अब पर्दे के पीछे के खिलाडिय़ों की भूमिका सामने आ रही है। ट्रंप ने अपने बयान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असिम मुनीर का नाम लिया है, लेकिन कुछ रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने भी अहम मध्यस्थता की है। आइए समझते हैं कि युद्धविराम पर कैसे सहमति बनी।
शीर्ष राजनयिक सूत्रों के हवाले से कहा है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व में सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असिम मुनीर और विदेश मंत्री इशाक डार ने घंटों तक अन्य संबंधित पक्षों के साथ बातचीत की। पाकिस्तान के नेतृत्व ने ट्रंप और वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के अधिकारियों सहित प्रमुख वैश्विक हस्तियों के साथ कई बार बातचीत की।
पाकिस्तान के युद्धविराम प्रस्ताव पर ईरान और अमेरिका को राजी करने में चीन की अहम भूमिका रही। रिपोर्ट के मुताबिक, एक वरिष्ठ चीनी अधिकारी ने कथित तौर पर सीधे अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस से सीधे बात की और युद्धविराम प्रस्ताव स्वीकार करने का आग्रह किया। वहीं, 2 चीनी अधिकारियों ने बताया कि ट्रंप की समयसीमा नजदीक आने के साथ ही चीन ने ईरान के साथ भी सीधे तौर पर बातचीत शुरू कर दी।
ट्रंप ने भी हिचकिचाते हुए युद्धविराम में चीन की भूमिका को स्वीकार किया है। जब ट्रंप से पूछा कि क्या चीन ईरान पर बातचीत के लिए दबाव डालने में शामिल था? तो ट्रंप ने कहा, हां, ऐसा सुनने में आ रहा है। हालांकि, इससे पहले कई रिपोर्ट में कहा गया था कि युद्ध के शुरू होने के बाद ही चीन पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र सहित मध्यस्थों के साथ मिलकर काम कर रहा था।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधिकारिक तौर पर चीन को युद्धविराम का श्रेय न देने के पीछे रणनीतिक वजहें थीं। लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ शनाका एंसलेम परेरा ने लिखा, चीनी दबाव को स्वीकार करने से बीजिंग उस युद्ध में एक सह-सहयोगी मध्यस्थ के रूप में स्थापित हो जाता, जिसे अमेरिका ने छेड़ा था। पाकिस्तान को श्रेय देकर ट्रंप चीन की भूमिका को छिपाए रखते हैं, जो इसे कमजोरी के रूप में देखेंगे।
चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है, जिसका एक बड़ा हिस्सा ईरान से आता है। अगर संघर्ष बढ़ता, तो ईरान से तेल का निर्यात पूरी तरह से रुक सकता था। एक और बुरी स्थिति तब हो सकती थी, जब अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण कर लेता। ये चीन के लिए बड़ा झटका होता। पश्चिम एशिया में किसी भी प्रकार का गंभीर तनाव चीन की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचा सकता था।
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