नई दिल्ली,16 अपै्रल (आरएनएस)। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आज दिल्ली हाईकोर्ट में फिर पेश होकर दलीलें रख सकते हैं. दरअसल केजरीवाल का नया हलफनामा अभी हाईकोर्ट की रिकॉर्ड पर नहीं आया है. केजरीवाल उस हलफनामे को रिकॉर्ड पर लाने की मांग कर सकते हैं. दरअसल, केजरीवाल ने हाईकोर्ट में नया हलफनामा दाखिल कर जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ नये आरोप लगाते हुए सुनवाई से हटने की मांग की है.
केजरीवाल ने हलफनामा में कहा है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अधीन काम करते हैं. तुषार मेहता उनके बच्चो को केस देते हैं. उनके हलफनामे में कहा गया है कि सीबीआई की तरफ से तुषार मेहता ही वकील हैं. ऐसे में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा तुषार मेहता के खिलाफ कैसे आदेश देंगी. इसके पहले 13 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल ने खुद दलीलें रखते हुए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच पर सवाल उठाते हुए सुनवाई से हटने की मांग की थी.
केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने की मांग करते हुए कहा था कि जिस तरह से अब तक इस मामले में अदालती कार्यवाही हुई है, उससे उन्हें निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं दिख रही है. उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा पर अविश्वास जताते हुए कहा था कि बिना पक्ष सुने सेशन कोर्ट के आदेश को गलत बताया. उन्होंने कहा था कि 9 मार्च को जब हाईकोर्ट में पहली सुनवाई हुई, तो वहां 23 में से एक भी आरोपी मौजूद नहीं था. कोर्ट में सिर्फ सीबीआई मौजूद थी. लेकिन जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने पहली ही सुनवाई में बिना दूसरी पक्ष की दलीलें सुने यह कह दिया कि प्रथम दृष्टया सेशंस कोर्ट का आदेश गलत लगता है. बिना रिकॉर्ड मंगवाए और बिना दलीलें सुने कोर्ट इस नतीजे पर कैसे पहुंच गया.
केजरीवाल ने कहा था कि बिना अर्जी के ईडी की कार्यवाही पर रोक लगाई. उन्होंने कहा था कि 9 मार्च को सीबीआई की अपील पर सुनवाई हो रही थी, लेकिन जस्टिस शर्मा ने ईडी की कार्यवाही पर भी रोक लगा दी. आरोपियों के मुताबिक, न तो केंद्र सरकार ने और न ही ईडी ने इसके लिए कोई प्रार्थना की थी. कानूनन, यदि मुख्य केस में अपराध साबित नहीं होता, तो ईडी का केस अपने आप कमजोर हो जाता है, सेशंस कोर्ट ने सीबीआई केस खत्म कर दिया था, जिससे ईडी का मामला भी खत्म होने वाला था, लेकिन जस्टिस शर्मा ने खुद से ही इस पर रोक लगा दी.
केजरीवाल ने कहा था कि इस मामले को पूर्व निर्धारित षड्यंत्र करार देते हुए सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही का आदेश दिया था, लेकिन जस्टिस शर्मा ने इस कार्यवाही पर भी रोक लगा दी, जबकि संबंधित अधिकारी ने इसके लिए कोई आवेदन ही नहीं किया था.
केजरीवाल का कहना था कि यह अस्वाभाविक सक्रियता शंका पैदा करती है. केजरीवाल ने कोर्ट की टाइमिंग पर भी सवाल उठाते हुए कहा था कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा आमतौर पर अन्य केसों में 3 से 7 महीने तक की तारीख देती हैं. लेकिन इस मामले में उन्होंने आरोपियों को जवाब दाखिल करने के लिए महज एक हफ्ते का समय दिया. 600 पन्नों के लंबे आदेश और सीबीआई की जटिल अपील का जवाब इतने कम समय में देना लगभग नामुमकिन है.
केजरीवाल ने अपनी अर्जी में कहा है कि जब पिछले साल पांच आरोपियों ने जमानत के लिए अर्जी लगाई थी, तब जस्टिस शर्मा ने जमानत खारिज करते हुए बहुत कठोर टिप्पणी की थी. कानूनन, बेल की स्टेज पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जाता, यह काम ट्रायल के बाद होता है. लेकिन जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में उन्हें पहले ही दोषी बता दिया, जो उनकी पूर्व-निर्धारित राय को दर्शाता है.
केजरीवाल ने अर्जी में कहा है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा द्वारा पारित किए गए इन सभी जमानत के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने बाद में रद्द कर दिया था. न केवल आदेश रद्द हुए, बल्कि आरोपियों को जमानत भी मिली और सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस शर्मा के रुख पर सख्त टिप्पणियां भी की. अर्जी में यह गंभीर आरोप भी लगाया गया है कि जस्टिस शर्मा सीबीआई और ईडी की दलीलों को अक्षरश: मान लेती हैं. यहां तक कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा मौखिक रूप से कही गई बातों पर भी तुरंत आदेश पारित कर दिए जाते हैं। आरोपियों का कहना है कि एजेंसियों की हर मांग को मान लेने से न्याय की उम्मीद धूमिल हो जाती है.
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