अजय दीक्षित
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 25 वर्षों की मेहनत का परिणाम है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने ममता बनर्जी की तुड़मूल कांग्रेस को हरा कर 207 सीट जीती और सत्ता हासिल की ।यह चमत्कार एक दिन या साल में नहीं हुआ बल्कि एक चौथाई शताब्दी लग गई। 21वीं सदी के आरंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य गतिशीलता से आरंभ हुआ हालांकि संघ आजादी के बाद से ही पश्चिमी बंगाल में जड़े जमाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन इस कार्य तेजी जब आई तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में सरकार बनी । तत्कालीन समय में संघ के क्षेत्रीय प्रचारक माखनलाल सरकार ने विद्या भारती की स्थापना की और कोलकाता में सरस्वती शिशु मंदिर स्थापित किए गए। धीरे धीरे ग्राम भारती, संस्कृत भारती, विश्व हिंदू परिषद, बनवासी कल्याण परिषद, मजदूर संघ,आदि संगठन बाजूद में आए। मजदूर संघ के प्रचारक तपन चक्रवर्ती कहते हैं कि लेफ्ट पार्टियों की सरकार ने इन संगठनों पर लगाम लगाने की कोशिश की । सीपीएम, सीपीई, आरएसपी के लोगों ने सरस्वती शिशु मंदिर को जलाने की कई कोशिशें की। कई शिक्षक मारे गए। लेकिन संघ ने हार नहीं मानी ।2010 के आते जाते 5000 से अधिक विद्यालय स्थापित हो गया था।
ये विद्यालय बिना शासकीय मदद के संचालित हो रहे थे।
लेकिन बंगाल में कार्य करना आसान नहीं होता था।इन विद्यालयों में ग्राम भारती, संस्कृत भारती, बनवासी कल्याण परिषद, सेवा भारती,के प्रकल्प शामिल है कुछ विद्यालय विवेकानन्द विद्या विकास समिति के माध्यम से भी संचालित हैं। भारत में पहला सरस्वती शिशु मंदिर गोरखपुर में 1952 में नाना जी देशमुख ने स्थापित किया था।
आजादी के समय जो देश का विभाजन हुआ उसमें मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र को पाकिस्तान में शामिल किया गया और वह क्षेत्र आजादी के बाद पूर्वी पाकिस्तान कहलाया इस हिस्से में हिंदू भी थे जिन्होंने भागकर पश्चिमी बंगाल में शरण ली ऐसा पंजाब में भी हुआ था। लेकिन तब भी पश्चिमी बंगाल में अच्छीखासी संख्या में मुस्लिम रह गए और वे भारत के नागरिक बने ।इनकी संख्या,25 फीसदी के आसपास पहुंच गए हैं। मिदनापुर,मालदा, वीरभूमि, मुर्शिदाबाद, उतर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, प्रेसीडेंसी, कोलकाता में 35 फीसदी तक मुस्लिम होगए।इस कारण ये लोग हिंसा करने को उतारू हो गए। हिंदू आवादी प्राय: शांत रहने की आदी है। दूसरे मुस्लिम वोट पहले सीपीएम, सीपीई, क्रस्क्क लेफ्ट पार्टियों जाता था और बाद में तृणमूल कांग्रेस से जुड़ गया जबकि हिन्दू वोट का बटवारा हो जाता था जिससे कोई भी पार्टी जीतती वह मुस्लिम तुष्टिकरण करती है। सरकारी योजनाओं का मुस्लिम जम कर उठा रहे थे। पूरे बंगाल में इस प्रकार का माहौल हो गया था।संघ की पत्रिका के संपादक जॉय बनर्जी कहते हैं कि संघ इस बात को लेकर चिंतित था।
2011में ममता बनर्जी बंगाल में सत्ता आई तो कुछ मामला ठीक हुआ लेकिन लेफ्ट पार्टियों में मुस्लिमों को खासा समर्थन था।2016 में भारतीय जनता पार्टी ने चुनावों में 11.42 वोट हासिल किए तो संघ को लगा कि अब मौका है । दूसरी ओर मोदी सरकार केंद्र में स्थापित हो गई थी तो सुरक्षा में भी इजाफा हुआ।
2019 के लोकसभा चुनाव में अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 लोकसभा सीट जीतकर सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोल दिया था।2021 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पूरी कोशिश की ।
तो भारतीय जनता पार्टी को आंशिक सफलता मिली लेकिन 77 विधायक चुने गए।2021 से 2026 तक के कालखंड में शिवेंदु अधिकारी, दिलीप घोष, लॉकेट चटर्जी,आदि नेताओं ने जमकर तुड़मूल का सड़को पर विरोध किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में जनजागरण का कार्य किया। लोगो का तुड़मूल में बहुत विरोध हुआ। संदेश खाली,आर जी कर जैसी महिलाओं पर अत्याचार जैसी घटनाएं हुई।
2025 का विधानसभा चुनाव बंगाल के हिंदुओं के लिए अंतिम मौका था । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने दो लाख बैठके जनजागरण के लिए की । एस आई आर मतदाता सूची के गहन परीक्षण से साठ लाख लोगों को फर्जी वोटर पाया।चुनाव आयोग ने 2400 बटालियन सीआरपीएफ की लगाई जो मतदाता को निर्भय होकर मतदान कराना निश्चित किया ।तब जाकर रिकॉर्ड 93 फीसदी मतदान हुआ । हिंदुओं के लिए अभी नहीं तो कभी नहीं की स्थिति थी इस चुनाव में। हिंदुओं का 70 फीसदी तक ध्रुवीकरण हुआ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में।
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