पूजा स्थल अधिनियम 1991 की भी अवहेलना उम्मीद है सुप्रीमकोर्ट बदल देगा- अरशद अली
प्रयागराज ,16 मई (आरएनएस)। अल्पसंख्यक के नि0 शहर अध्यछ अरशद अली ने कहा है कि भोजशाला – कमाल मौला मस्जिद को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा मंदिर घोषित कर दिया जाना न्यायिक कम राजनैतिक फैसला ज़्यादा है. क्योंकि कथित एएसआई रिपोर्ट पर मुस्लिम पक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का संज्ञान ही हाईकोर्ट द्वारा नहीं लिया गया। वहीं इस मामले में पूजा स्थल अधिनियम 1991 की भी अवहेलना की गई है। उन्होंने उम्मीद जतायी है कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के इस फैसले को पलट देगा।
अरशद अली ने कहा कि पूजा स्थल अधिनियम स्पष्ट तौर पर कहता है कि 15 अगस्त 1947 तक धार्मिक स्थलों का जो भी चरित्र था वो यथावत रहेगा। इसे चुनौती देने वाले किसी भी प्रतिवेदन या अपील को किसी न्यायालय, न्यायाधिकरण (ट्रिब्युनल) या प्राधिकार (अथॉरिटी) के समक्ष स्वीकार ही नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि इंदौर हाईकोर्ट का यह फैसला 12 दिसंबर 2024 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन के उस आदेश की भी अवमानना है जिसमें उन्होंने अदालतों को मस्जिदों और मंदिरों के दावों पर कोई भी याचिका स्वीकार करने, लंबित मामलों में कोई भी आदेश जारी करने पर रोक लगायी थी। कांग्रेसी नेता ने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि निचली अदालतें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना कर रही हैं और सुप्रीम कोर्ट अपनी अवमानना पर चुप्पी साधे हुए है. जिससे साबित होता है कि ऐसे फैसले सत्ताधारी गिरोह के राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए दिए जा रहे हैं।
कांग्रेस नेता ने कहा कि सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की तरफ से कथित एएसआई रिपोर्ट पर यह आपत्ति जताई गई थी कि कमाल मौला मस्जिद- भोजशाला मंदिर की रिपोर्ट में हर जगह एएसआई ने उसे ‘भोजशाला मंदिरÓ लिखा। रिपोर्ट की यह भाषा उसकी निष्पक्षता को पहले ही संदिग्ध बना देती है. जिसपर आश्चर्यजनक तौर पर कोर्ट ने कोई संज्ञान नहीं लिया। वहीं एएसआई पर यह भी आरोप लगा कि उसने मस्जिद पक्ष को न तो उत्खनन के कलर दिए और जो वीडियो दिए भी वो भी बहुत छोटे थे। जबकि मस्जिद पक्ष ने उन्हें यह उपलब्ध कराने की मांग बारबार की थी। वहीं मस्जिद पक्ष के वकीलों के इस तर्क का भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया कि एएसआई ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के विरुद्ध जाकर भौतिक उत्खनन क्यों किया जिससे ढांचे के आकार और दिखावट में बदलाव आ गया। वहीं मस्जिद पक्ष की इस दलील पर भी कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया कि खुदाई में एक पटिया के नीचे से प्लास्टिक की बोतलें, पेपर कप और अन्य प्लास्टिक की चीज़ें और वो भी बिल्कुल साफ़ सुथरी कैसे मिल सकती हैं। जबकि ये वस्तुएं 13 वीं या 14 वीं सदी की नहीं हो सकतीं जब इसके बनने का दावा किया जा रहा है।
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