श्रीनगर,21 मई (आरएनएस)। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने मातृत्व को एक संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि इससे काम की जगह पर भेदभाव नहीं हो सकता. कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर बैंक की उन महिला कर्मचारियों के खिलाफ अपील खारिज कर दी है, जिनकी मैटरनिटी लीव की वजह से उनके स्थायी होने और वेतन लाभ में देरी हुई थी.
जम्मू में चीफ जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस राजेश ओसवाल की अगुवाई वाली डिवीजन बेंच ने अपने 15 पेज के फैसले में कहा कि बैंक ने मां बनने के दौरान अपनी महिला कर्मचारियों को सपोर्ट करने के बजाय उनके खिलाफ अपनी इंस्टीट्यूशनल ताकत दिखाने का फैसला किया.
बेंच ने कहा, अपील करने वाले बैंक, जो एक बड़ी बैंकिंग कंपनी है और जिसका भारत में बहुत बड़ा कारोबार है, ने दुख की बात है कि अपनी महिला कर्मचारियों के खिलाफ अपनी इंस्टीट्यूशनल ताकत का इस्तेमाल किया है.
कोर्ट ने कहा,उनके मातृत्व को समझने और सम्मान देने के बजाय, बैंक ने उनके साथ उनके साथियों के मुकाबले बुरा भेदभाव किया है. साथ ही कहा, इस स्तर के इंस्टीट्यूशन का ऐसा दबंग रवैया पूरी तरह से गलत है और कानून में इसे सही नहीं ठहराया जा सकता.
इस फैसले में तनु गुप्ता (इस मामले में उत्तरदाता) समेत चार महिला कर्मचारियों के पक्ष में पहले के सिंगल जज के आदेश को बरकरार रखा गया, जिनके मैटरनिटी लीव पीरियड को नियमितीकरण के लिए उनकी दो साल की संविदात्मक सेवा की गणना करते समय हटा दिया गया था.
यह विवाद तब पैदा हुआ जब बैंक ने मैटरनिटी लीव को सर्विस में ब्रेक मान लिया, जिससे महिला कर्मचारियों का नियमितीकरण 31 दिसंबर, 2020 के बाद भी टल गया.
इस वजह से, वे बदले हुए पे स्केल और समायोजन वेतन लाभ के लिए पात्रता खो बैठे, जो कट-ऑफ डेट से पहले स्थायी हुए कर्मचारियों को मिलते थे. बेंच ने कहा कि इस तरह का बर्ताव असल में महिलाओं को मां बनने के लिए सजा देता है.
अदालत ने कहा, स्वीकृत मातृत्व अवकाश को सेवा में विराम के रूप में वर्गीकृत करना उन्हें उक्त परिपत्र के लाभों से वंचित करना भेदभावपूर्ण है.
जजों ने बड़े संस्थानों और कर्मचारियों, खासकर रोजगार की सुरक्षा चाहने वाली महिलाओं के बीच असमान पावर समीकरण पर भी जोर दिया. कोर्ट ने कहा, असल में, उत्तरदाताओं के पास बराबर मोलभाव करने की कोई पावर नहीं थी; वे पूरी तरह से नियोक्ता की दया पर थे, जहां नियमितीकरण की शर्तों के खिलाफ कोई भी विरोध करने पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता.
कामकाजी मांओं पर भावनात्मक सोच के साथ फैसले की शुरुआत करते हुए बेंच ने लिखा, एक कामकाजी मां का जीवन प्राचीन संस्कृत आदर्श ‘क्षमाया धारित्रीÓ का एक गहरा प्रमाण है – एक ऐसा धैर्य जो पृथ्वी जितना ही विशाल और टिकाऊ हो.
अदालत ने कहा, प्रसव का गहरा दर्द जीवन भर के त्याग की कहानी का शुरुआती अध्याय मात्र है.
इसमें आगे कहा गया, मैटरनिटी बेनिफिट्स से मना करना न सिर्फ इस गहरे ‘दोहरे बोझÓ को नजरअंदाज करना है, बल्कि उन लोगों के लिए बराबर मौके पक्का करने की हमारी संवैधानिक जिम्मेदारी में पूरी तरह से नाकाम होना है जो सचमुच नागरिकों की अगली पीढ़ी को बनाने के लिए मेहनत करते हैं.
कोर्ट ने आर्टिकल 14, 15 और 42 के तहत मिली संवैधानिक गारंटी के साथ-साथ मैटरनिटी राइट्स और जेंडर जस्टिस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा किया.
सुप्रीम कोर्ट की पिछली बातों का जिक्र करते हुए, बेंच ने दोहराया कि बच्चे के जन्म को रोजगार के संदर्भ में जीवन की एक स्वाभाविक घटना के तौर पर समझना होगा.
कोर्ट ने बैंक की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि महिलाओं ने मैटरनिटी लीव से जुड़ी शर्तों को मान लिया था और इसलिए वे बाद में उन्हें चुनौती नहीं दे सकतीं.
बेंच ने कहा, जबकि सहमति एक बराबरी की ढाल की तरह काम करती है, इसे बुनियादी अधिकारों को हराने के लिए हथियार नहीं बनाया जा सकता; जहां कोई संवैधानिक उल्लंघन साफ दिखता है, वहां बराबरी को कानून के राज के लिए रास्ता बनाना चाहिए. मालिकों और कर्मचारियों के बीच बराबर मोलभाव की ताकत न होने का जिक्र करते हुए, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की शेर और मेमने वाली मिसाल का जिक्र किया और कहा कि संवैधानिक अदालतों को कमजोर मजदूरों को शोषण से बचाना चाहिए.
फैसले में कहा गया, ऐसी स्थितियों में, संवैधानिक अदालतों की अंतरात्मा को अनिवार्य रूप से मेमने की रक्षा के पक्ष में झुकना चाहिए. कोर्ट ने आखिर में यह नतीजा निकाला कि महिला कर्मचारियों के पक्ष में पहले का फैसला सोच-समझकर, साफ और पूरी तरह से कानून के मुताबिक था और बैंक की दोनों अपीलें खारिज कर दीं.
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