शिक्षा का प्रसार करने में भारत सफल है, मगर स्कूल से यूनिवर्सिटी तक लर्निंग क्वालिटी, तर्क-बुद्धि, शिक्षक क्षमता और रोजगार लायक योग्यता प्रदान करने के मामले में वह गहरे संकट का सामना कर रहा है।
गुणवत्ता संपन्न ज्ञान एवं तर्क क्षमता प्रदान करने के मामले में भारत की स्कूली शिक्षा गंभीर संकट का सामना कर रही है। नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट- ‘भारत में स्कूल शिक्षा प्रणाली: सामयिक विश्लेषण एवं गुणवत्ता वृद्धि के लिए नीतिगत मार्गÓ- में यह बात स्वीकार की है। आयोग ने ये विस्तृत रिपोर्ट यूडीआईएसई+, एनएएस, प्रदर्शन आकलन समीक्षा, परख और असर रिपोर्टों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर तैयार की है। एक वाक्य में इसका सार है- ‘शिक्षा का प्रसार करने में भारत ने सफलता हासिल की है, मगर लर्निंग क्वालिटी, शिक्षक क्षमता, और रोजगार पाने लायक योग्यताÓ प्रदान करने जैसे मामलों में वह गहरे संकट का सामना कर रहा है।Ó
प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक यही सूरत मौजूद है। स्पष्टत: शिक्षा के प्रसार से मतलब स्कूलों में दाखिले से है। आज देश में 14.7 लाख स्कूल, तकरीबन 24.7 करोड़ बच्चे और एक करोड़ शिक्षक हैँ। मगर बुनियादी ज्ञान प्राप्त एवं प्रदान करने के मोर्चे पर स्थिति नाजुक है। ऊंचे क्लास में पहुंच जाने के बावजूद ज्यादातर छात्र निचले वर्ग का पाठ पढऩे या अंकगणित के प्रश्नों को हल करने में नाकाम बने रहते हैं। क्लास बढऩे के साथ समस्या बढ़ती चली जाती है। कई राज्यों के विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता कमजोर है, शिक्षा का स्तर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्ध्या के योग्य नहीं है, शिक्षा संस्थान फंडिंग और संचालन संबंधी समस्याओं से ग्रस्त हैं और इन सबका नतीजा है कि डिग्री लेकर निकले छात्रों को बाजार रोजगार के योग्य नहीं मानता।
आयोग ने कहा है कि बिखराव- ग्रस्त स्कूल प्रणाली, शिक्षकों की कमी, और असमान लर्निंग की स्थिति जैसे मसलों को हल नहीं किया गया, तो प्रगति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकेगा। रिपोर्ट में शिक्षा व्यवस्था में आमूल सुधार की जरूरत बताई गई है। आधुनिक दौर के मुताबिक इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्मित करने का सुझाव दिया गया है। मगर ये होगा कैसे? बजट पर गौर करें, तो साफ है शिक्षा सरकारों की प्राथमिकता नहीं है। ऊपर से ज्ञान एवं तर्क विरोधी माहौल राजनीतिक परियोजना के तहत बनाया जा रहा है। ऐसे में छात्र सीखने एवं तर्क करने की दिशा में कैसे प्रेरित होंगे?
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