अजय दीक्षित
पूरे देश में चुनाव आयोग द्वारा कराई जा रही मतदाता सूची विशेष गहन परीक्षण (एस आई आर) को सर्वोच्च न्यायालय ने वैध ठहराया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली छह जजों की संविधान पीठ ने चुनाव आयोग को हरी झंडी दे दी है। फैसले में कहा गया है कि जनप्रतिनत्व अधिनियम 1951की अनुच्छेद आठ ए के अनुसार मतदाता सूची में संशोधन करने का अधिकार भारत के निर्वाचन आयोग को है।
फैसले में कहा गया है कि मतदाता सूची में नाम बढऩा घटना
निर्वाचन आयोग का क्षेत्राधिकार है। सी जे आई सूर्यकांत ने सी ए ए ( नागरिकता) मसले पर कहा कि मतदाता सूची के साथ साथ नागरिकता संशोधन बिल को क्रियान्वयन के लिए
केंद्र सरकार एक प्राधिकरण बनाए और यह प्राधिकरण तय करेंगे कि किसकी नागरिकता बैद्य है । उन्होंने कहा है कि नागरिकता तय करने का अधिकार भारत के गृह मंत्रालय को है ।
उल्लेखनीय है कि बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व एस आई आर पर एक जनहित याचिका योगेंद्र यादव द्वारा दायर की गई थी और इस मुद्दे पर कांग्रेस, टीएमसी डीएमके,ने बड़ी आपत्ति जताई थी क्योंकि बिहार से 64 लाख मतदाता सूची से नाम पृथक किए गए थे हालांकि इनमें से अधिकतर वे लोग थे जो या तो दूसरे स्थान पर चले गए थे तो मृत हो चुके थे। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो देश के नागरिक ही थे और उन्होंने बड़ी संख्या में असम,बिहार, पश्चिमी बंगाल, पूर्वोत्तर राज्यों में घुसपैठ कर बांग्लादेश, म्यांमार,से आए हैं। एस आई आर में पश्चिमी बंगाल में एक करोड़, उत्तर प्रदेश में दो करोड़,असम में 63 लाख, सहित सभी राज्यों मप्र, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना,में पचास, पचास लाख से अधिक मतदाता सूची से पृथक हुए।नेता प्रतिपक्ष लोकसभा राहुल गांधी ने बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व वोट चोरी यात्रा भी निकाली थी।डीएमके के स्टालिन ने और पश्चिमी बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता ने तो आसमान सिर पर उठा लिया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह पर मुस्लिमों को मतदाता सूची से नाम पृथक करने आरोप जड़ दिये थे । निर्वाचन आयोग के मुख्य आयुक ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का नोटिस भी विपक्षी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को दिया है।
तमाम मीडिया ट्रायल में योगेंद्र यादव, आशुतोष, पुण्य प्रश्नुन वाजपेई, रविश कुमार, और भी कई सौ अधिक प्रेस कलाकारों ने बंगाल विधानसभा चुनाव, बिहार विधानसभा चुनाव असम विधानसभा चुनाव में एस आई आर पर बिना सोचे समझे प्रश्न खड़े कर दिए थे बल्कि इनकी देख देखी जनता में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई थी।
भारतीय जनता पार्टी को कई आरोपों का सामना करना पड़ा
लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के इस संदेश से कम से कम उन लोगों भ्रम दूर हो जाएगा। राजनीतिक लोग विशेष कर तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस,सपा, डीएमके,के नेताओं को विधानसभा चुनाव निष्पक्ष चश्मे से देखने का संदेश दे दिया है। अगर आज सर्वोच्च न्यायालय अगर यह फैसला नहीं देता तो बिहार विधानसभा चुनाव,बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम, पांडिचेरी हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र,के चुनावों पर पश्न चिन्ह लग जाता था।
जहां तक प्रश्न सी ए ए नागरिकता का है सर्वोच्च न्यायालय ने अभी गेंद भारत सरकार की ओर फेंक दी है। रिटायर्ड जज, नौकरशाह, पूर्व चुनाव आयुक्त की कमेटी तय करेंगे कि नागरिकता तय करने के कौन कौन से नियम होगे । फैसले में नेशनल सिटीजन रजिस्टर बनाने की प्रक्रिया को भी तेज करने के आदेश केंद्रीय गृह मंत्रालय को दिए हैं। भारत सॉलिसिटर जनरल ने सर्वोच्च न्यायालय से एक माह का समय मांगा है।
गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया है कि सरकार अब नागरिकता को लेकर सतर्क है।जिन लोगों को मतदाता सूची से पृथक किया गया है उनकी नागरिकता समाप्त होने के अंदेशा है।
क्योंकि गृह मंत्रालय को एनआरसी बनाना है।दरअसल इस देश
आजादी बाद से नागरिकता, घुसपैठ, चकमा घुसपैठ,पर कभी कोई ध्यान नहीं दिया बल्कि कांग्रेस,ने असम, पश्चिमी बंगाल,बिहार दिल्ली में घुसपैठियों को बसाया और अब 15 वर्ष पहले इनको वोट की खातिर वोटर लिस्ट में शामिल किया और वोटिंग कार्ड, आधार कार्ड मुहैया करवाने का काम किया।बताया जाता है कि तीन करोड़ अवैध नागरिक है पूरे देश में जिसमें एक करोड़ तो बंगाल में ही हैं।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि मतदाता सूचियों के साथ साथ, नागरिकता संशोधन भी हो । सरकार के समक्ष
परमानेंट राष्ट्रीय नागरिक पंजी ( एन आर सी) हो जिससे नीति आयोग को पूरे देश में योजनाओं को लागू करना सुविधा जनक हो। स्व चलित मतदाता सूची हो जन्म और मृत्यु का पंजीयन हो । नागरिक की आयु 18 वर्ष होने पर स्वत ही मतदाता बन जाए।
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