नई दिल्ली,05 जुलाई(आरएनएस)। संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) में हुई बगावत से जुड़े मामलों पर महत्वपूर्ण निर्णय ले सकते हैं। दोनों दलों ने अपने-अपने बागी सांसदों को दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित करने की मांग की है। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा।
सूत्रों के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ने तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल तथा पार्टी से अलग हुए सांसदों के समूह, दोनों पक्षों की दलीलें सुन ली हैं। इसी प्रकार की प्रक्रिया शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के मामले में भी अपनाई गई है।
बताया जा रहा है कि संसद के विधि एवं संवैधानिक विशेषज्ञ इस पूरे प्रकरण का गहन अध्ययन कर रहे हैं। कानूनी रूप से मजबूत निर्णय सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञ पूर्व में विभिन्न पीठासीन अधिकारियों द्वारा दिए गए फैसलों तथा स्थापित न्यायिक और संसदीय परंपराओं का भी परीक्षण कर रहे हैं। इन्हीं सुझावों के आधार पर लोकसभा अध्यक्ष 20 जुलाई से पहले अपना अंतिम निर्णय सुना सकते हैं।
तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के बागी सांसदों के मामलों के अलावा द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) ने भी लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था का अनुरोध किया है। यह मांग कांग्रेस द्वारा तमिलनाडु में दशकों पुराने गठबंधन को समाप्त कर मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के साथ राजनीतिक समझौता करने के बाद सामने आई है।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के 29 सांसद निर्वाचित हुए थे। इनमें से 20 सांसदों ने पार्टी छोड़कर पश्चिम बंगाल के हावड़ा में पंजीकृत, लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) का दामन थाम लिया है। इस समूह ने लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है।
बागी सांसदों ने केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के प्रति समर्थन व्यक्त करते हुए सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल होने की इच्छा भी जताई है। उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद का कुछ समय पहले निधन हो चुका है, जिससे एक सीट वर्तमान में रिक्त है।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के टिकट पर निर्वाचित नौ सांसदों में से छह सांसद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने की घोषणा कर चुके हैं। इसके बाद पार्टी ने इन सांसदों के विरुद्ध भी दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग की है।
तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) दोनों का कहना है कि दल-बदल विरोधी कानून के अनुसार किसी सांसद को अयोग्यता से तभी छूट मिल सकती है, जब किसी दल के कुल निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्य एक साथ अलग होकर दूसरे दल में विलय करें। दोनों दलों का आरोप है कि उनके बागी सांसद इस संवैधानिक प्रावधान का लाभ लेने की पात्रता नहीं रखते, इसलिए उन्हें लोकसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह निर्णय न केवल दोनों राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि भविष्य में दल-बदल से जुड़े मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संसदीय मिसाल बन सकता है।
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