नई दिल्ली, 08 जुलाई (आरएनएस)। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जहां कभी नक्सल हिंसा ने घर, गांव और ज़िंदगियां उजाड़ दी थीं, वहीं आज शांति की वापसी के साथ उम्मीद फिर से दीवारों पर आकार ले रही है। छत्तीसगढ़ के अति नक्सल प्रभावित जिला नारायणपुर में अब बंदूक की जगह विकास की गूंज सुनाई दे रही है। सुरक्षा बलों की तैनाती, आत्मसमर्पण नीति और सरकारी योजनाओं के कारण हालात सामान्य होने के बाद नक्सल पीड़ित परिवार धीरे-धीरे अपने गांवों में लौट रहे हैं।वापसी के साथ सबसे बड़ी चुनौती थी – सिर पर छत। इस चुनौती का समाधान प्रधानमंत्री आवास योजना – ग्रामीण के तहत किया जा रहा है। योजना के अंतर्गत पात्र परिवारों को पक्के घर बनाकर दिए जा रहे हैं। टीन-तिरपाल और अस्थायी झोपड़ियों में जीवन बिताने को मजबूर लोग अब ईंट, सीमेंट और आरसीसी की छत वाले घरों में शिफ्ट हो रहे हैं।आवासों में शौचालय, बिजली कनेक्शन, रसोई और पेयजल की सुविधा भी दी जा रही है। प्रशासन का कहना है कि प्राथमिकता उन परिवारों को दी गई है जो हिंसा के कारण विस्थापित हुए थे या जिनके घर नक्सलियों द्वारा क्षतिग्रस्त कर दिए गए थे।गांव लौटे ग्रामीणों के चेहरे पर राहत साफ दिख रही है। कोहका गांव की सुखमती बाई बताती हैं, “10 साल बाद अपने गांव लौटे हैं। पहले डर लगता था, अब घर बन गया तो लगता है जिंदगी फिर से शुरू हो गई।” एक अन्य लाभार्थी ने कहा कि पक्का घर मिलने से बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा दोनों सुनिश्चित हुई है।जिला प्रशासन ने बताया कि नारायणपुर में PM आवास के तहत सैकड़ों घरों का निर्माण अंतिम चरण में है। साथ ही सड़क, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल और मोबाइल टावर जैसी बुनियादी सुविधाएं भी तेजी से बढ़ाई जा रही हैं ताकि लोग दोबारा पलायन न करें।स्थानीय जनप्रतिनिधियों का मानना है कि पक्के घर सिर्फ आश्रय नहीं हैं, बल्कि ये विश्वास की नींव हैं। जब परिवार को लगता है कि सरकार उनके साथ है, तभी गांव में स्कूल खुलते हैं, बाजार लगते हैं और खेतों में फिर से हल चलता है।नारायणपुर की यह तस्वीर पूरे बस्तर के लिए एक संदेश है – हिंसा से उजड़े गांव विकास से फिर बसाए जा सकते हैं। दीवारों पर अब नारे नहीं, बल्कि बच्चों की ऊंचाई के निशान और त्योहारों के रंग दिख रहे हैं। शांति लौटी है, और उसी के साथ लौटा है घर का सपना।
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