0-अमेरिकी न्याय विभाग ने गंभीर आरोप लगाए, अंतिम निर्णय भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में
नई दिल्ली,10 जुलाई(आरएनएस)। अमेरिका के न्याय विभाग द्वारा जेल में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई और उसके सहयोगियों पर संगठित आपराधिक गिरोह चलाने, हत्या, जबरन वसूली, मादक पदार्थों एवं हथियारों की तस्करी जैसे गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद उसके संभावित प्रत्यर्पण को लेकर चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि अमेरिका निकट भविष्य में भारत से लॉरेंस बिश्नोई के प्रत्यर्पण का औपचारिक अनुरोध कर सकता है। हालांकि यदि ऐसा होता भी है तो उसे अमेरिका को सौंपने का निर्णय एक लंबी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद ही लिया जाएगा।
भारत में प्रत्यर्पण संबंधी व्यवस्था प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 के तहत संचालित होती है। इसी कानून के आधार पर भारत विभिन्न देशों के साथ प्रत्यर्पण संधियां करता है। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत की 48 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधियां हैं। भारत और अमेरिका के बीच वर्ष 1997 में प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर हुए थे।
इस संधि का प्रमुख आधार दोहरे अपराध का सिद्धांत है। इसके अनुसार किसी व्यक्ति का प्रत्यर्पण तभी किया जा सकता है जब संबंधित अपराध दोनों देशों के कानूनों में दंडनीय हो और उसके लिए एक वर्ष या उससे अधिक कारावास का प्रावधान हो।
अमेरिका की ओर से लॉरेंस बिश्नोई पर हत्या, आपराधिक साजिश, जबरन वसूली, मादक पदार्थों की तस्करी और हथियारों की तस्करी जैसे आरोप लगाए गए हैं। इन सभी अपराधों के लिए भारतीय कानून में भी कठोर दंड का प्रावधान है। इसलिए प्रथम दृष्टया ये आरोप प्रत्यर्पण संधि की शर्तों के अनुरूप माने जा सकते हैं।
संधि में यह भी स्पष्ट किया गया है कि दोनों देशों के कानूनों में अपराध का नाम या श्रेणी पूरी तरह समान होना आवश्यक नहीं है, बल्कि उसका मूल स्वरूप और दंडनीय होना महत्वपूर्ण है।
भारत-अमेरिका प्रत्यर्पण संधि के तहत हत्या, आतंकवाद, बंधक बनाना, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों में शामिल व्यक्तियों का प्रत्यर्पण संभव है। हालांकि राजनीतिक प्रकृति के अपराधों में प्रत्यर्पण नहीं किया जाता।
संधि में स्पेशियलिटी के नियम का भी प्रावधान है। इसके अनुसार प्रत्यर्पित व्यक्ति पर सामान्यत: केवल उन्हीं अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, जिनके आधार पर उसका प्रत्यर्पण किया गया हो।
यदि अमेरिका लॉरेंस बिश्नोई का प्रत्यर्पण चाहता है तो सबसे पहले अमेरिकी न्याय विभाग औपचारिक अनुरोध तैयार कर भारत के विदेश मंत्रालय को भेजेगा। इसके बाद विदेश मंत्रालय गृह मंत्रालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और अन्य संबंधित एजेंसियों से परामर्श कर यह जांच करेगा कि अनुरोध प्रत्यर्पण संधि और भारतीय कानून के अनुरूप है या नहीं।
यदि केंद्र सरकार प्रारंभिक स्तर पर अनुरोध को उचित मानती है तो मामला संबंधित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों और संधि की शर्तों की समीक्षा कर यह तय करेगा कि आरोपी प्रत्यर्पण के योग्य है या नहीं। इसके बाद अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी जाएगी।
प्रत्यर्पण को अंतिम मंजूरी देने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है। सरकार आवश्यक शर्तें लगा सकती है, अतिरिक्त राजनयिक आश्वासन मांग सकती है अथवा अनुरोध को अस्वीकार भी कर सकती है। सरकार के निर्णय को उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, जिससे पूरी प्रक्रिया लंबी हो सकती है।
लॉरेंस बिश्नोई वर्तमान में भारत में न्यायिक हिरासत में है और उसके विरुद्ध विभिन्न राज्यों में हत्या, रंगदारी, संगठित अपराध और अन्य गंभीर मामलों की सुनवाई चल रही है। ऐसी स्थिति में भारत सरकार यह तर्क दे सकती है कि पहले उसे भारतीय अदालतों में लंबित मुकदमों का सामना करना होगा और यदि दोषी ठहराया जाता है तो सजा भी पूरी करनी होगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका औपचारिक प्रत्यर्पण अनुरोध भेजता भी है तो भारत तत्काल उसे सौंपने के लिए बाध्य नहीं होगा। अंतिम निर्णय भारतीय कानून, प्रत्यर्पण संधि की शर्तों, न्यायालय की राय और केंद्र सरकार के विवेकाधिकार पर निर्भर करेगा।
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