०स्थानांतरण नीति का मखौल: खुद के व्यय पर दो बार ट्रांसफर कराने के बाद भी बीजापुर छोडऩे को तैयार नहीं
०शिकायतों के बाद विभागीय मंत्री ने 20 दिन पहले जारी किया था कड़ा फरमान, स्थानीय स्तर पर बना सुरक्षा कवच
बीजापुर,12 जुलाई (आरएनएस)। छत्तीसगढ़ शासन जहाँ एक ओर प्रशासनिक पारदर्शिता और जीरो टॉलरेंस का दम भर रहा है, वहीं बस्तर संभाग के बीजापुर जिले में पशुपालन विभाग के कारनामे सरकार की साख पर बट्टा लगा रहे हैं। बीजापुर में पदस्थ सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी नरोत्तम समरथ ने तबादला नीति और सीधे विभागीय मंत्री के आदेश को ही बंधक बना लिया है। 30 जून 2025 में विभाग द्वारा जारी की गई बड़ी तबादला सूची के बाद कई अधिकारियों ने नई जगहों पर जॉइन कर लिया, लेकिन बीजापुर का यह खास महीनों बाद भी अंगद की तरह अपनी कुर्सी से चिपका हुआ है।दो बार खुद के खर्च पर ट्रांसफर, फिर भी बीजापुर से ‘अटूट मोहविभागीय गलियारों में यह मामला बेहद चर्चा और कौतूहल का विषय बना हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, उक्त का पूर्व में दो-दो बार ‘स्वयं के व्यय पर ट्रांसफर आदेश जारी हुआ था। सामान्यत: सरकारी सेवा में कर्मचारी अपने ट्रांसफर को रुकवाने के लिए परेशान रहते हैं, लेकिन यहाँ माजरा बिल्कुल उल्टा है। खुद के खर्च पर ट्रांसफर करवाने के बाद भी यह बीजापुर से टस से मस होने को तैयार नहीं है। आखिर बीजापुर की इस धरा पर ऐसा कौन सा ‘अमृत बरस रहा है, जिसके मोह में यह ्र नियम-कायदों को ठेंगा दिखा रहा हैमंत्री के कड़े रुख पर भारी पड़ी उपसंचालक की ‘कृपाइस की कार्यप्रणाली को लेकर क्षेत्र के पशुपालकों और ग्रामीणों द्वारा लगातार गंभीर शिकायतें की जा रही थीं। मामला जब सीधे पशुपालन मंत्री के पास पहुंचा, तो उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए 22 जून 2026 को विभाग को दो टूक निर्देश दिए थे कि उक्त को तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त कर नई पदस्थापना वाली जगह भेजा जाए। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि मंत्री के इस कड़े रुख और लिखित निर्देश के 20 दिन बीत जाने के बाद भी बीजापुर उपसंचालक डॉ राजीव कुमार शर्मा गहरी नींद में सोए हुए है। मंत्री के आदेश को ठंडे बस्ते में डालना सीधे तौर पर शासन की सत्ता को चुनौती देने जैसा है।इस पूरे मामले में स्थानीय उपसंचालक डॉ राजीव कुमार शर्मा की भूमिका पहले दिन से ही संदिग्ध नजर आ रही है। आखिर एक छोटे स्तर के कर्मचारी को बचाने के लिए जिला स्तर का इतना बड़ा अधिकारी अपनी साख दांव पर क्यों लगा रहा है? क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक लापरवाही है या इसके पीछे कोई गहरा वित्तीय और व्यक्तिगत हित छिपा है
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