नई दिल्ली,13 जुलाई(आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के मान्यता प्राप्त मदरसों के टीचरों और नॉन-टीचिंग कर्मचारियों की कई याचिकाओं को खारिज कर दिया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2023 में बनाई गई एक कमेटी द्वारा राज्य सरकार की ग्रांट-इन-एड स्कीम के तहत रेगुलर अपॉइंटमेंट और पेमेंट देने से मना करने को चुनौती दी थी.
यह फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने सुनाया. यह मामला 300 से ज़्यादा लोगों की 40 से ज़्यादा रिट पिटीशन से जुड़ा था, जिनमें दावा किया गया था कि उन्हें राज्य के अलग-अलग मदरसों में टीचर या नॉन-टीचिंग स्टाफ के तौर पर नियुक्त किया गया है.
सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि पहले के ऑर्डर के हिसाब से उसने 300 से ज़्यादा प्रभावित पिटीशनर में से 13 की डिटेल्स की जांच की थी, ताकि यह देखा जा सके कि उनमें से किसी ने राहत देने का मामला बनाया है या नहीं. बेंच ने कहा कि वह इस आधार पर आगे बढ़ी कि अगर इन 13 पिटीशनर में से कोई भी उसे अपने पक्ष में फैसला सुनाने के लिए मना लेता है, तो वह बाकी मामलों की भी जांच करेगी. बेंच ने सभी पिटीशन खारिज करते हुए कहा, बदकिस्मती से 13 में से कोई भी पिटीशनर हमें प्रभावित नहीं कर सका.
बेंच ने साफ किया कि उसने न सिर्फ उन सभी 13 पिटीशनर्स के क्लेम खारिज कर दिए जिनके केस की स्क्रूटनी की गई थी, बल्कि बाकी सभी पिटीशनर्स के क्लेम भी खारिज कर दिए. बेंच ने कहा, सभी रिट पिटीशन्स में कोई दम नहीं है और इसलिए उन्हें खारिज किया जाता है.
यह विवाद वेस्ट बंगाल मदरसा सर्विस कमीशन एक्ट, 2008 से जुड़ा है. इस एक्ट ने मान्यता प्राप्त मदरसों में टीचर्स के अपॉइंटमेंट्स की सिफारिश करने के लिए एक स्टैच्युटरी कमीशन बनाया था. कलकत्ता हाई कोर्ट की सिंगल-जज बेंच ने 2014 में इस एक्ट को रद्द कर दिया था, और 2015 में डिवीजन बेंच ने इसे बरकरार रखा था.
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2020 में 2008 के एक्ट की कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी को बरकरार रखा. बाद में सवाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले किए गए अपॉइंटमेंट्स की वैलिडिटी पर आ गया. सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2023 में एक पैनल बनाया था ताकि कलकत्ता हाई कोर्ट के 2015 के फैसले के बाद लेकिन 2020 के फैसले से पहले किए गए अपॉइंटमेंट की वैलिडिटी तय की जा सके. पैनल ने एक रिपोर्ट में यह नतीजा निकाला कि ऐसे अपॉइंटमेंट इनवैलिड थे, और परेशान पार्टियों ने इसे चैलेंज किया.
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