पूनम भाटिया
सोनम वांगचुक इस समय दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनका आरोप है कि हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं ने लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित किया है। वे जवाबदेही तय करने और शिक्षा व्यवस्था में ठोस सुधारों की माँग कर रहे हैं।
अभी तक उपलब्ध विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नीट-यूजी 2026 परीक्षा रद्द होने और पुन: परीक्षा की घोषणा के बाद 37 दिनों के भीतर कम-से-कम 12 अभ्यर्थियों की आत्महत्या के मामले सामने आए। यह संख्या सरकारी आँकड़ा नहीं, बल्कि विभिन्न राज्यों में हुई घटनाओं का समाचार-पत्रों द्वारा किया गया संकलन है।
द इंडियन एक्सप्रेस की 2024 की जाँच के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में 15 राज्यों में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक के 41 दस्तावेजि़त मामले सामने आए, जिनसे लगभग 1.4 करोड़ अभ्यर्थी प्रभावित हुए और 1.04 लाख से अधिक सरकारी पदों पर भर्ती की प्रक्रिया बाधित हुई। यदि इसमें 2025-26 की प्रमुख घटनाएँ भी जोड़ दी जाएँ, तो एनईईटी-यूजी 2026, यूजीसी-नेट 2024, यूपी पुलिस कांस्टेबल 2024, यूपीपीएससी आरओ/एआरओ 2024, यूकेएसएसएससी और एचपीएससी सहायक प्रोफेसर सहित कई परीक्षाएँ रद्द या पुन: आयोजित करनी पड़ीं। कुछ मीडिया विश्लेषणों के अनुसार, पिछले सात वर्षों में 70 से अधिक बड़े पेपर लीक के मामलों से लगभग 1.7 करोड़ अभ्यर्थी प्रभावित हुए।
एक राष्ट्र तभी आगे बढ़ता है, जब उसकी शिक्षा व्यवस्था भरोसेमंद, सुलभ और न्यायपूर्ण हो। यदि परीक्षा बिकने लगे, अवसर छिनने लगें और मेहनत का मूल्य कम हो जाए, तो समाज की सबसे बड़ी पूँजी, उसका युवा निराशा का शिकार हो जाता है। शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि सपनों, आत्मसम्मान और भविष्य की नींव है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा दायित्व निष्पक्षता और समान अवसर सुनिश्चित करना है।
आज देश का युवा दोहरी मार झेल रहा है। एक ओर बढ़ती बेरोजग़ारी है, दूसरी ओर नौकरी और उच्च शिक्षा तक पहुँचने का रास्ता लगातार कठिन होता जा रहा है। लाखों छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं और परिवार अपनी जमा-पूँजी कोचिंग तथा परीक्षा की तैयारी पर खर्च कर देता है। लेकिन जब परीक्षा प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान केवल परिणाम का नहीं, बल्कि व्यवस्था पर से विश्वास का होता है।
वर्ष 2024-25 में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग की खुली बेरोजग़ारी दर लगभग 11 से 12 प्रतिशत के बीच मानी गई। ऐसे समय में प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं की हर घटना युवाओं की निराशा को और गहरा करती है। निजी कोचिंग, टेस्ट सीरीज़ और अध्ययन सामग्री पर एक परिवार को साल भर में लगभग पचास हजार से दो लाख रुपये तक खर्च करना पड़ता है, जो मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के लिए भारी बोझ है।
पिछले वर्ष नीट परीक्षा में लगभग 23 लाख अभ्यर्थियों ने पंजीकरण कराया था। सीमित सीटों के बीच परीक्षा रद्द होने या अनियमितता की हर घटना लाखों विद्यार्थियों का समय, आत्मविश्वास और जीवन के बहुमूल्य वर्ष छीन लेती है। राजस्थान सहित कई राज्यों में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं के रद्द होने से हजारों अभ्यर्थियों को दोबारा उसी अनिश्चितता और तैयारी के दौर से गुजरना पड़ा।
समय-समय पर नियमों और पाठ्यक्रम में होने वाले बदलाव भी तब चिंता का विषय बन जाते हैं, जब वे छात्रों के लिए अनावश्यक कठिनाइयाँ पैदा करें। शिक्षा का केंद्र छात्र होना चाहिए, न कि केवल नियमों की लंबी सूची।
समय आ गया है कि शिक्षा को बाज़ार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार माना जाए। किसी की मेहनत, सपनों और भविष्य की कीमत तय करने का अधिकार न किसी भ्रष्ट व्यवस्था को है और न ही पैसे या पहुँच के बल पर अवसर खरीदने वालों को क्योंकि सच यही है कि हमें हक़ नहीं शिक्षा में किसी का भविष्य खरीदने का…
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

