भारत का वस्त्र एवं परिधान उद्योग देश की अर्थव्यवस्था, विनिर्माण और निर्यात का एक मजबूत आधार है। यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 2 प्रतिशत तथा विनिर्माण सकल मूल्य संवर्धन में लगभग 11 प्रतिशत का योगदान देता है। भारत वैश्विक स्तर पर वस्त्र एवं परिधान का छठा सबसे बड़ा निर्यातक है और विश्व निर्यात में उसकी लगभग 4 प्रतिशत हिस्सेदारी है। यह उद्योग 4.5 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराता है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और ग्रामीण श्रमिक शामिल हैं।
बदलते वैश्विक बाजार और पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच भारत अब वस्त्र उद्योग में चक्रीय अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) को बढ़ावा देकर सतत विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार जैविक रेशों, सुरक्षित रसायनों, पुनर्चक्रण, अपशिष्ट प्रबंधन, पर्यावरण-अनुकूल प्रमाणन और उत्पादों की ट्रेसबिलिटी (उत्पत्ति का पता लगाने की व्यवस्था) जैसी पहलों को प्रोत्साहित कर रही है।
क्या है चक्रीय अर्थव्यवस्था
चक्रीय अर्थव्यवस्था ऐसी व्यवस्था है, जिसमें उत्पादों और संसाधनों का अधिकतम समय तक उपयोग किया जाता है। पुराने उत्पादों का पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और अपसाइक्लिंग (पुरानी वस्तु को अधिक उपयोगी उत्पाद में बदलना) करके अपशिष्ट और प्रदूषण को कम किया जाता है। इससे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है और उत्पादन अधिक टिकाऊ बनता है।
भारत में वस्त्र अपशिष्ट का बड़ा हिस्सा हो रहा पुन: उपयोग
भारत में हर वर्ष लगभग 78 लाख टन वस्त्र अपशिष्ट का प्रबंधन किया जाता है। इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक अपशिष्ट कारखानों और उपभोक्ताओं से प्राप्त होता है। कुल अपशिष्ट का 70 प्रतिशत से अधिक भाग पुन: प्राप्त कर पुनर्चक्रण, पुन: उपयोग या अपसाइक्लिंग में लगाया जाता है।
उपभोक्ता से पहले उत्पन्न होने वाले वस्त्र अपशिष्ट का लगभग 95 प्रतिशत संगठित मूल्य श्रृंखला के माध्यम से वापस उत्पादन में उपयोग किया जाता है। कताई उद्योग में लगभग पूरा अपशिष्ट पुन: उत्पादन प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाता है। वहीं उपयोग के बाद फेंके गए वस्त्रों का लगभग 55 प्रतिशत लैंडफिल में जाने से बचा लिया जाता है।
यह संपूर्ण व्यवस्था देश में 40 से 45 लाख लोगों की आजीविका का आधार बनी हुई है, जिसमें महिलाओं और वंचित वर्गों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
देश के सफल वस्त्र पुनर्चक्रण मॉडल
नवी मुंबई मॉडल
नवी मुंबई के बेलापुर में देश की पहली नगर निगम आधारित वस्त्र पुनर्प्राप्ति सुविधा स्थापित की गई है। यहां अब तक 30 मीट्रिक टन वस्त्र अपशिष्ट एकत्र किया गया, 25.5 मीट्रिक टन की छंटाई की गई तथा 41 हजार से अधिक उत्पाद तैयार किए गए हैं। 400 से अधिक अपसाइक्लिंग नमूने विकसित किए गए और 1.14 लाख परिवारों तक इसकी पहुंच बनी है।
पानीपत बना पुनर्चक्रण का प्रमुख केंद्र
हरियाणा का पानीपत देश का सबसे बड़ा वस्त्र पुनर्चक्रण केंद्र बन चुका है। यहां प्रतिदिन लगभग 3500 से 5250 टन वस्त्र अपशिष्ट का प्रसंस्करण किया जाता है। यहां संग्रहण, छंटाई, पुनर्चक्रण और बुनाई की समग्र व्यवस्था विकसित हो चुकी है।
मंगोलपुरी का कतरन बाजार
दिल्ली के मंगोलपुरी में स्थित कतरन बाजार अनौपचारिक क्षेत्र के सफल पुनर्चक्रण मॉडल का उदाहरण है। यहां प्रतिदिन 10 टन से अधिक कपड़े की कतरन छांटकर पानीपत भेजी जाती है, जिससे पुनर्चक्रण उद्योग को कच्चा माल मिलता है।
जैविक रेशों और प्राकृतिक फाइबर को बढ़ावा
सरकार जैविक कपास और अन्य प्राकृतिक रेशों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है।
राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम के माध्यम से जैविक कपास सहित विभिन्न उत्पादों का प्रमाणन किया जा रहा है।
जूट-आईकेयर कार्यक्रम के जरिए वैज्ञानिक जूट खेती, बेहतर बीज और आधुनिक तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है।
न्यू एज फाइबर मिशन के अंतर्गत रेमी, सिसल, अलसी जैसे प्राकृतिक रेशों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
राष्ट्रीय फाइबर योजना घरेलू फाइबर उत्पादन बढ़ाने तथा आयात पर निर्भरता कम करने पर केंद्रित है।
खतरनाक रसायनों पर सख्ती
सरकार वस्त्र उद्योग में हानिकारक रसायनों के उपयोग को कम करने के लिए कई कदम उठा रही है।
भारत में बेंजिडीन आधारित रंगों और 70 प्रकार के एजो डाई पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। इसके अलावा भारत स्टॉकहोम कन्वेंशन के तहत स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों पर नियंत्रण की दिशा में भी कार्य कर रहा है।
वस्त्र फैशन आपूर्ति श्रृंखला से खतरनाक रसायनों को हटाने की परियोजना के अंतर्गत 400 कारखानों को शामिल किया गया है। इससे लगभग 1.47 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन में कमी तथा 10,530 टन हानिकारक रसायनों के उपयोग में कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है।
हरित विनिर्माण को बढ़ावा
सरकार प्रधानमंत्री मेगा एकीकृत वस्त्र क्षेत्र एवं परिधान पार्क (पीएम मित्र पार्क) योजना के माध्यम से आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल वस्त्र पार्क विकसित कर रही है।
इन पार्कों में—
साझा अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र,
अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण,
वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन,
साझा अवसंरचना
जैसी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं।
सात पीएम मित्र पार्कों के विकास के लिए 4445 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। दिसंबर 2025 तक 27,434 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को हरित प्रोत्साहन
देश के वस्त्र उत्पादन में 80 प्रतिशत से अधिक योगदान देने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए सरकार ने रैम्प कार्यक्रम के अंतर्गत दो प्रमुख योजनाएं शुरू की हैं—
हरित निवेश एवं प्रौद्योगिकी योजना के तहत स्वच्छ ऊर्जा अपनाने पर ब्याज सब्सिडी और ऋण गारंटी।
चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रोत्साहन योजना के तहत संयंत्र एवं मशीनरी निवेश पर 25 प्रतिशत पूंजी अनुदान।
कार्बन उत्सर्जन पर निगरानी
भारतीय कार्बन बाजार व्यवस्था के अंतर्गत वस्त्र उद्योग को भी शामिल किया गया है। अब उद्योगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन का विवरण देना अनिवार्य होगा। निर्धारित लक्ष्य से बेहतर प्रदर्शन करने वाले उद्योगों को कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र दिए जाएंगे, जिनका व्यापार भी किया जा सकेगा।
वस्त्र अपशिष्ट प्रबंधन को नई दिशा
1 अप्रैल 2026 से लागू नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को शामिल किया गया है। इसमें उत्पादकों की जिम्मेदारी बढ़ाई गई है तथा अपशिष्ट पृथक्करण और संसाधन पुनर्प्राप्ति पर विशेष बल दिया गया है।
राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन के अंतर्गत वस्त्र अपशिष्ट, जैविक अवशेष और बायोमास से उन्नत हरित सामग्री विकसित करने के लिए अनुसंधान परियोजनाओं को भी मंजूरी दी गई है।
पर्यावरण-अनुकूल प्रमाणन और बाजार सहायता
सरकार ने इको मार्क योजना 2024 के तहत पर्यावरण-अनुकूल वस्त्र उत्पादों के लिए प्रमाणन व्यवस्था शुरू की है।
साथ ही कस्तूरी कॉटन और सिल्क मार्क जैसी पहल भारतीय वस्त्रों की गुणवत्ता और ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित कर रही हैं।
सरकारी खरीद में पुनर्चक्रित उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए वस्त्र समिति, सरकारी ई-मार्केटप्लेस और सार्वजनिक उपक्रमों के संगठन के बीच समझौता किया गया है।
जागरूकता अभियान भी तेज
वस्त्र उद्योग में सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए सस्टेनेबल रेजोल्यूशन (सु.रे.), सर्कल बैक अभियान, पर्यावरण, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं सुशासन (ईएसजी) कार्यबल तथा भारत टेक्स जैसे कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
भारत टेक्स अब देश का प्रमुख वैश्विक वस्त्र आयोजन बन चुका है, जहां फाइबर से लेकर परिधान, तकनीकी वस्त्र, नवाचार और सतत उत्पादन तक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को एक मंच मिलता है।
सतत भविष्य की ओर भारत
भारत की पारंपरिक संस्कृति में वस्त्रों का पुन: उपयोग, मरम्मत और संसाधनों का संरक्षण सदियों से जीवन शैली का हिस्सा रहा है। अब इन्हीं परंपराओं को आधुनिक तकनीक, हरित नीतियों और चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों के साथ जोड़कर भारत वैश्विक वस्त्र उद्योग में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मजबूत कर रहा है।
जैविक रेशों का उपयोग, सुरक्षित रसायन, स्वच्छ उत्पादन, पुनर्चक्रण, अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण-अनुकूल प्रमाणन जैसी पहलें न केवल उद्योग को अधिक टिकाऊ बना रही हैं, बल्कि रोजगार, निर्यात और पर्यावरण संरक्षण के नए अवसर भी सृजित कर रही हैं। आने वाले वर्षों में भारत का वस्त्र उद्योग आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन दोनों का सशक्त उदाहरण बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
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