नई दिल्ली ,18 जुलाई(आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने एक हत्या के आरोपी को जमानत दे दी, जो नौ साल से अधिक समय से जेल में था. कोर्ट ने कहा कि ट्रायल में लगातार देरी और लंबे समय तक जेल में रहना कोर्ट की न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर देता है.
यह आदेश 16 जुलाई को जस्टिस एमएम सुंदरेश और पीबी वराले की पीठ ने पास किया था. याचिकाकर्ता लियाकत अली ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत की मांग करते हुए कहा कि वह नौ साल और दो महीने से ज़्यादा समय से जेल में बंद है. उन्होंने दावा किया कि मुकदमा कछुए की चाल से चल रहा है, इसमें उनकी कोई गलती नहीं है.
अदालत ने कहा कि वर्ष 2024 में आरोपी की पिछली जमानत याचिका पर अंतिम निर्णय हो जाने के बाद भी मुकदमे की सुनवाई में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई. अब तक अभियोजन पक्ष के 30 में से केवल 12 गवाहों की ही गवाही दर्ज की जा सकी है.
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि कथित घटना के समय याचिकाकर्ता एक छोटा लड़का था. यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित है. वकील ने कहा कि बेगुनाही के अनुमान को नियंत्रण करने वाले सिद्धांतों पर विचार किया जाना चाहिए – कि जमानत नियम है और जेल अपवाद है.
जम्मू और कश्मीर के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता को नई जमानत आवेदन फाइल करने से कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि उसके खिलाफ लगाए गए जुर्म रणबीर पैनल कोड, 1989 के सेक्शन 302, 382, 201 और सेक्शन 34 के तहत सज़ा के लायक हैं और इसमें दखल देने की कोई जरूरत नहीं है.
उन्होंने कहा, ”सामान्य स्थिति में हम इस याचिका पर विचार नहीं करते. लेकिन, ट्रायल में लगातार देरी और लंबे समय तक जेल में रहना हमारी कानूनी समझ को झकझोर देता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कथित घटना के समय याचिकाकर्ता किशोर था और उस पर हालात के सबूतों के आधार पर हत्या करने का आरोप लगाया गया है.
पीठ ने कहा कि उसे बिना किसी गलती के नौ साल और दो महीने से जेल में रखा गया है. इस रफ़्तार से, ट्रायल में और समय लगने की संभावना है. पीठ ने कहा, जब आरोपी जेल में होता है, तो कोर्ट और अभियोजन एजेंसी की यह जि़म्मेदारी होती है कि वे ट्रायल में तेज़ी लाएं.
पीठ ने कहा, मामले के तथ्य को देखते हुए, हम याचिकाकर्ता को जमानत देकर भारत के संविधान के आर्टिकल 32 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहते हैं, जिसके लिए संबंधित ट्रायल कोर्ट को सही शर्तें लगानी होंगी.
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