:-जिम्मेदार नर्स ने पल्ला झाड़ा
गोण्डा 23 नवंबर। एक तरफ जहां सरकार सरकारी अस्पताल में गरीबो को निशुल्क चिकित्सा उपलब्ध कराने और समस्त दवाएं और जांच फ्री करवाने का दावा करते नहीं थक रही दूसरी तरफ सरकारी अस्पताल में आक्सीजन के अभाव, दवाएं खरीदने की क्षमता न होने और जांच करवाने में अक्षम होने के चलते लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। गत शुक्रवार रात लगभग नौ बजे इमरजेंसी वार्ड में भर्ती गंगादेयी ने आक्सीजन के अभाव में जिला अस्पताल से रिफर होकर एक निजी अस्पताल में पहुंचते ही दम तोड दिया। प्राप्त समाचार के अनुसार ग्राम गदापुरवा थाना परसपुर निवासिनी गंगादेयी पहले 19 नवंबर को जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती हुई फिर 20 नवंबर को टीबी चेक करवाया और टीबी की लगभग तीन हजार की दवा बाहर से लिख दिया। जिसके बाद 21 नवंबर को दुबारा गंगादेयी की तबीयत बिगडऩे पर स्वशासी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला चिकित्सालय के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया। इमरजेंसी में जब पेशेंट को लगाया आक्सीजन बंद मिला तो हमारे संवाददाता ने इमरजेंसी के डाक्टरों से सम्पर्क किया इस पर डाक्टरो ने कहा कि इमरजेंसी वार्ड में ड्यूटी नर्स से बात करिए। नर्स से बात करने पर नर्स ने कहा कि बंद हो गया तो हम क्या कर सकते हैं। नर्स से नाम पूछने पर उसने नाम बताने से इंकार कर दिया। इमरजेंसी के डाक्टरों ने कहा कि इमरजेंसी वार्ड के डाक्टर और नर्स अलग होते हैं। आक्सीजन उन्हीं की जिम्मेदारी है। स्थिति से मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य धनंजय श्रीकांत कोटस्थाने और मुख्य चिकित्सा अधीक्षक को अवगत कराया गया तब जाकर नर्स ने एक सिलेंडर लगाकर आक्सीजन सप्लाई चालू किया जो 15 मिनट के अन्दर समाप्त हो गया। इसके बाद आक्सीजन सप्लाई चालू हुई और तब डा0 अनुराग त्रिपाठी आये और उन्होंने मरीज को रेफर करने को कहा। इस दौरान विबो बदलने में मरीज़ को कई जगह छेदने के बावजूद स्टाफ असफल साबित हुआ। फिर किसी और अनुभवी स्टाफ को बुलाया गया, परन्तु तब तक रेफर का कागज बन चुका था और परिजनों ने मरीज को ले जाना ही उचित समझा और एक निजी नर्सिंग होम ले गये, जहां पर आक्सीजन लगाते ही बिना और कोई इलाज किये ही गंगादेयी का देहांत हो गया। परिजनों के अनुसार सरकारी अस्पताल में बाहर की दवा इंजेक्शन लिख दिया गया और टीबी अस्पताल में भी बाहर की लगभग तीन हजार की दवा लिखी गई। दो दिनों में चार से पांच हजार दवा जांच आदि में खर्च हो गया। इमरजेंसी में सारी दवाइयां बाहर की ही दी जा रही है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि एक तरफ सरकार टीबी मुक्त भारत बनाना चाहती है टीबी मरीज़ को फ्री दवा के अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी देती है दूसरी तरफ अस्पताल के डाक्टरों द्वारा एक ही बार में टीबी की तीन हजार की दवा बाहर से लिख दी जाती है। यही कारण है कि मरीज अस्पताल जाने से डरता है और अन्तिम समय पर ही अस्पताल जाता है। प्रकरण पर अपर निदेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण से बात करने पर उन्होंने कहा कि इमरजेंसी में भर्ती मरीजों को बाहर की दवाई लिखना या जांच लिखना उचित नहीं है यह नियम विरुद्ध है।
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

