आरएनएस 26 नवंबर 2025 /छत्तीसगढ़ की परंपरा में सुवा नृत्य का विशेष महत्व है। सुआ का मतलब तोता होता है। इस नृत्य को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। यह नृत्य खासकर छत्तीसगढ़ के अंचलों में किया जाता है। इस विधा में नृत्य के साथ-साथ सुमधुर सुवा गीत भी महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से गाए जाते हैं । इस नृत्य में महिलाएं और लड़कियां एक बांस की टोकरी में चावल रखकर उसमें मिट्टी से बना तोता रखती हैं। इस बांस की टोकरी को लेकर लड़कियां और महिलाएं समूह में घूमती हैं और सुआ नृत्य करती हैं। नृत्य के साथ-साथ महिलाएं गीत भी गाती हैं और ताली बजाती हैं।सुआ नृत्य गीत कुमारी कन्याओं तथा विवाहित स्त्रियों द्वारा समूह में गाया और नाचा जाता है। इस नृत्य गीत के परंपरा के अनुसार बाँस की बनी टोकरी में धान रखकर उस पर मिट्टी का बना, सजाया हुआ सुवा रखा जाता है। लोक मान्यता है कि टोकरी में विराजित यह सुवा की जोड़ी शंकर और पार्वती के प्रतीक होते हैं।
मान्यताओं के अनुसार जब महिलाएं गांव में किसानों के घर सुवा गीत नृत्य करने जाती थीं, तो उन्हें उस नृत्य के लिए उपहार स्वरूप पैसे या अनाज दिए जाते थे। इसका उपयोग गौरा-गौरी के विवाह उत्सव में किया जाता है। इस नृत्य की दूसरी मान्यता यह है कि सुआ नृत्य की शुरुआत दिवाली के दिन से की जाती है। जिसका मतलब है कि धान की फसल कट चुकी है। अब खुशियों के दिन आ गए हैं।सुआ गीत की मान्यता यह है कि सुआ गीत नृत्य करने महिलाएं जब गांव में किसानों के घर-घर जाती थीं. तब उन्हें उस नृत्य के उपहार स्वरूप पैसे या अनाज दिया जाता है. इसका उपयोग गौरा-गौरी के विवाह उत्सव में करती हैं।
इस नृत्य की दूसरी मान्यता यह है कि सुआ नृत्य की शुरुआत दीपावली के दिन से की जाती है, और ऐसा माना जाता है कि दीपावली तक किसानों के खेतों में से धान की फसल कट जाया करते थे. इसी की खुशी में घर-घर जाकर युवतियाँ यह नृत्य किया करती थी और उपहार स्वरूप उन्हें नया अनाज दिया जाता था। यह नृत्य, छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति का अहम हिस्सा है। यह नृत्य, भगवान की पूजा से जुड़ा है। सुआ नृत्य में, महिलाएं बांस के बर्तन में तोता रखती हैं और उसके चारों ओर घूमकर नृत्य करती हैं। सुआ नृत्य, दीपावली के दिन से शुरू होकर अगहन महीने तक चलता है। सुआ नृत्य में, महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजती हैं और अपने सिर पर घुंघरू बांधती हैं।सुआ नृत्य के ज़रिए, महिलाएं अपने जीवन के अलग-अलग पहलुओं और पारिवारिक भावनाओं को व्यक्त करती हैं।
सुआ नृत्य के दौरान गाए जाने वाले गीतों में, जीवन की कठिनाइयों, प्रेम, विरह, और धार्मिक मान्यताओं का वर्णन होता है। सुआ नृत्य में, महिलाएं तोते के ज़रिए संदेश देती हैं। सुआ नृत्य करने वाली महिलाओं को, लोग उपहार स्वरूप चावल, धान, या पैसे देते हैं।सुआ नृत्य की शुरुआत दीपावली के दिन से की जाती है। सुवा नृत्य गीत कुमारी कन्याओं तथा विवाहित स्त्रियों द्वारा समूह में गाया और नाचा जाता है। इस नृत्य गीत के परंपरा के अनुसार बाँस की बनी टोकरी में धान रखकर उस पर मिट्टी का बना, सजाया हुआ सुवा रखा जाता है।
सुआ गीत छत्तीसगढ़ राज्य के गोंड स्त्रियों का नृत्य गीत है। यह दीपावली के पर्व पर महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला गीत है। इस लोकगीत में स्त्रियां तोते के माध्यम से संदेश देते हुए गीत गाती हैं। इस गीत के जरिए स्त्रियां अपने मन की बात बताती हैं, इस विश्वास के साथ कि वह (सुवा) व्यथा उनके प्रिय तक पहुँचेगी।सुआ नृत्य के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गांव हो या शहर हर तरफ दीपावली के अवसर पर छोटी बच्चियों से लेकर बड़ी बुजुर्ग महिलाओं तक सुआ नृत्य करते दिखाई दे जाती हैं।
यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समुदाय की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है।इस नृत्य के माध्यम से महिलाएं अपनी फसल कटाई के बाद की खुशियों को साझा करती हैं और सभी के लिए आने वाले समय में समृद्धि की कामना करती हैं।दीपावली के समय इसका आयोजन खासतौर पर होता है।यह नृत्य छत्तीसगढ़ के विभिन्न जनजातियों, विशेष रूप से गोंड, बैगा और हल्बा जनजातियों में प्रचलित है, जो इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मनाते हैं. वर्तमान दौर में यह नृत्य आदिवासी परंपराओं से आगे बढ़कर अब सामान्य संस्कृति का हिस्सा बन चुका है. यह नृत्य सामुदायिक एकता को भी बढ़ावा देता है, क्योंकि इसे सामूहिक रूप से आयोजित किया जाता है, जिसमें गांव के सभी लोग हिस्सा लेते हैं। अब तो छत्तीसगढ़ के बड़े-बड़े शहरों में भव्य समारोह आयोजित कर छत्तीसगढ़ी सुआ नृत्य एवं गीत के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में प्रतिस्पर्धाएं भी रहती है। जिसमें हमारे देश के विभिन्न प्रांतो के प्रतिभागी भी बड़े मनोयोग और उत्साह से हिस्सा लेते हैं। चलिए इसी क्रम में सबसे लोकप्रिय सुवा गीत का आनंद ले।
तरी हरी नहा री ना ना री सुवा ना
चलो मन बंसरी बजावे जिहां मोहना रे
राधा रानी नाचे ठुमा ठु~म
रास रचावे जिहां गोकुल गुवाला रे
मिरदंग बाजे धुमा धुम
मोर सुवा ना मिरदंग बाजे धुमा धु~म
तरी हरी नहा ना रे, नाना मोर सुवा ना
तरी हरी नाना रे नाना~
तरी हरी नहा ना रे, नाना मोर सुवा ना
तरी हरी नाना रे नाना~
तरी हरी नहा ना रे, नाना मोर सुवा ना।।
तरी हरी नहा ना रे, नाना मोर सुवा ना।।
सुरेश सिंह बैस शाश्वत

