रायपुर 26 नवम्बर 2025 (आरएनएस) वीनू जयचंद /भारत आज़ादी के बाद होने वाले सबसे बड़े श्रम सुधारों में से एक के करीब है। चार नई श्रम संहिताएं- वेतन संहिता
(वेज़ कोड), इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड और ऑक्युपेशनल सेफ़्टी, हेल्थ एंड वर्किंग
कंडीशंस कोड- अब लागू हो चुके हैं। इन संहिताओं का उद्देश्य पुराने और जटिल 29 केंद्रीय मज़दूरी क़ानूनों
की जगह एक सरल, तकनीक-आधारित और मज़दूर-केंद्रित व्यवस्था स्थापित करना है।
यह सुधार सिर्फ़ प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि एक बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन है, जो यह दिखाता है
कि भारत एक न्यायपूर्ण, प्रतिस्पर्धी, समावेशी और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप कार्यबल प्रणाली बनाने
के लिए प्रतिबद्ध है। यही प्रणाली आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूत आधार देती है।
बिखराव से एकरूपता तक
कई दशकों तक भारत में मज़दूरी कानून बहुत बिखरे हुए और एक-दूसरे से ओवरलैप करते रहे। इससे
उद्योगों पर भारी नियमों का बोझ पड़ा और अनुपालन करना मुश्किल हो गया। केंद्र और राज्य के
अलग-अलग क़ानूनों के तहत कई तरह के पंजीकरण, लाइसेंस और निरीक्षणों ने लागत बढ़ाई, मज़दूरों के
कल्याण से ध्यान हटाया और अक्सर उद्योग और सरकार के बीच अविश्वास पैदा किया। क़ानूनों के
बिखराव और अस्पष्टता के कारण लागू करने की प्रक्रिया भी कमजोर रही, जिससे "इंस्पेक्टर राज" जैसे
मनमाने तरीके पनपे और पारदर्शिता कमज़ोर हुई।
नई मज़दूरी संहिताएं पूरे देश में परिभाषाओं और अनुपालन नियमों को एक जैसा बनाती हैं। इसके साथ
ही "वन नेशन, वन लेबर लॉ" का सिद्धांत लागू होता है। इससे नियोक्ताओं और कर्मचारियों दोनों को
स्पष्ट, सरल और न्यायपूर्ण प्रक्रियाओं का फायदा मिलता है।
एकीकृत पंजीकरण और डिजिटल व्यवस्था से दोहराव खत्म होता है, प्रक्रियाएं तेज होती हैं और जवाबदेही
मजबूत होती है। वेतन, लाभ और कामकाजी परिस्थितियों की एक जैसी परिभाषाएँ पूरे भारत में लागू
होंगी, जिससे विवाद कम होंगे और नियमों का पालन आसान और एकसमान होगा। सीधे शब्दों में, नई
मज़दूरी संहिताएं पुराने, जटिल, औपनिवेशिक ढांचे को हटाकर एक सरल, प्रभावी व्यवस्था लाती हैं जो
नवाचार, रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देती है।
सामाजिक सुरक्षा केंद्र में
मज़दूरी संहिताओं की सबसे बड़ी विशेषता सामाजिक सुरक्षा का बड़ा विस्तार और सुधार है। अंतरराष्ट्रीय
श्रम संगठन के अनुसार, भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज 2015 में लगभग 19% आबादी से बढ़कर
2025 में 64% से अधिक हो गया है, जो लगभग 94 करोड़ लोगों को शामिल करता है। नई मज़दूरी
संहिताएं इस प्रगति को आगे बढ़ाते हुए, श्रम कानूनों के केंद्र में सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा को मजबूत
रूप से स्थापित करती हैं। देशभर में न्यूनतम फ़्लोर वेतन की व्यवस्था और सभी कर्मचारियों को
अनिवार्य नियुक्ति पत्र देने जैसे प्रावधान आय सुरक्षा को बढ़ाते हैं, श्रमिकों के औपचारिकरण को आसान
बनाते हैं और पूरे मज़दूर बाज़ार में न्याय और समानता को प्रोत्साहित करते हैं।
बदलती कामकाज की दुनिया को पहचानना
नई संहिताएं मानती हैं कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में कामकाज का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, जहां
गिग और प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले श्रमिकों की संख्या बढ़ रही है। पहली बार, ऐसे श्रमिकों को
कानूनी पहचान दी गई है और उनके लिए खास सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई है, जिसके लिए
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म भी हिस्सा डालेंगे।
राष्ट्रीय ई-श्रम पोर्टल गिग और असंगठित श्रमिकों को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है, जिससे वे
अलग-अलग योजना लाभ आसानी से प्राप्त कर सकें और सामाजिक सुरक्षा को एक शहर से दूसरे या
एक ऐप से दूसरे ऐप पर ले जा सकें। सोचिए, कोई डिलीवरी कर्मी बिना किसी परेशानी के शहर बदल ले
या ऐप बदल ले, फिर भी उसकी सामाजिक सुरक्षा जारी रहे।
राज्यों के बीच काम करने वाले प्रवासी मजदूरों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। नई संहिताओं में उन्हें
लाभ एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाने की सुविधा, हर साल घर जाने के लिए यात्रा भत्ता और उनकी
समस्याएं कम करने के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं।
ऑक्युपेशनल सेफ़्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड कार्यस्थल की सुरक्षा के मानकों को और ऊंचा करता
है, जिससे भारत के वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण केंद्र बनने के लक्ष्य को मजबूती मिलती है।
इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड में लाया गया फ़िक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट का प्रावधान नियोक्ताओं को लचीलापन
देता है, जबकि श्रमिकों के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।
महिलाएं, युवा और जनसांख्यिकीय लाभ
मज़दूरी संहिताओं से महिलाओं और युवाओं को विशेष रूप से अधिक लाभ मिलता है, जो भारत की
विकास यात्रा के लिए बेहद महत्वपूर्ण समूह हैं। समान काम के लिए समान वेतन और बेहतर न्यूनतम
वेतन महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को मजबूत करते हैं। बेहतर मातृत्व लाभ, सुरक्षित कार्यस्थल और
नियंत्रित नाइट शिफ्ट की सुविधा महिलाओं के लिए अधिक अवसर और सुरक्षा प्रदान करती है।
युवाओं के लिए औपचारिक नौकरियों में प्रवेश, अप्रेंटिसशिप और कौशल विकास कार्यक्रमों का रास्ता और
स्पष्ट हुआ है, जिससे उनकी रोजगार क्षमता बढ़ती है और करियर में आगे बढ़ने के अवसर मजबूत होते
हैं।
इन सुधारों से सुरक्षा और अधिकारों को आधुनिक रूप मिलता है और काम के अवसरों का विस्तार होता
है, जिससे भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभ का बेहतर इस्तेमाल कर पाता है-अर्थात अधिक गुणवत्तापूर्ण
नौकरियाँ और मज़दूरों की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा।
आत्मनिर्भर भारत और 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को सक्षम बनाना
ये सुधार आत्मनिर्भर भारत के पांच स्तंभों के साथ पूरी तरह मेल खाते हैं। यह अनुपालन की लागत
कम करके और निवेश आकर्षित करके आर्थिक विकास को गति देते हैं। आधुनिक सुरक्षा नियमों और
राष्ट्रीय स्तर पर मज़दूरों के डेटाबेस के ज़रिए यह देश के बुनियादी ढाँचे को मजबूत करते हैं। एकीकृत
निरीक्षण प्रणाली और राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म शासन को पूरी तरह डिजिटल युग में ले जाते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात, ये सुधार भारत की युवा आबादी और बदलते कामकाज के नए तरीकों को
पहचानते हैं, प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं और महिलाओं व युवाओं के लिए अधिक
अवसर पैदा करते हैं। श्रम संहिताएं आमदनी बढ़ाकर, वेतन की सुरक्षा मजबूत करके और सामाजिक
सुरक्षा का दायरा बढ़ाकर मांग (डिमांड) को भी बढ़ाती हैं। इससे परिवारों का भरोसा बढ़ता है। कुल
मिलाकर, ये सुधार विकास और समानता का एक मजबूत चक्र बनाते हैं, जो भारत की प्रगति की यात्रा
को गति देता है।
कार्यान्वयन: सबसे अहम अगला कदम
श्रम संहिताएं बदलाव का एक मजबूत खाका देती हैं, लेकिन उनका पूरा असर तभी दिखेगा जब इन्हें
समय पर और प्रभावी तरीके से लागू किया जाएगा। इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच अच्छा तालमेल,
नियमों और दिशानिर्देशों में स्पष्टता, और निरीक्षण अधिकारियों व नियोक्ताओं, दोनों की क्षमता बढ़ाना
जरूरी होगा। इसी तरह, एमएसएमई और मज़दूरों तक सक्रिय रूप से जानकारी पहुंचाना भी बहुत
महत्वपूर्ण है, ताकि नए कानूनों के लाभ और जिम्मेदारियों को हर कोई अच्छी तरह समझ सके और
उन्हें अपनाए।
भारत @ 2047 के लिए नया सामाजिक अनुबंध
चार श्रम संहिताओं का लागू होना एक ऐतिहासिक क्षण है, जो भारत के कार्यबल यानि वर्कफ़ोर्स के लिए
एक नए सामाजिक अनुबंध की शुरुआत करता है। ये संहिताएँ कारोबार करना आसान बनाती हैं, जीवन
को सरल करती हैं, मज़दूरों के अधिकारों की सुरक्षा करती हैं, उद्योगों को मजबूत बनाती हैं और एक
ऐसी शासन व्यवस्था लाती हैं जो पारदर्शी, तकनीक-आधारित और पूरे देश में एकसमान है। यह सिर्फ़
मज़दूरी सुधार नहीं है, बल्कि एक सचमुच आधुनिक कार्यबल प्रणाली की बुनियाद है। यह वह
परिवर्तनकारी कदम है जिसका असर आने वाले कई दशकों तक भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास
में दिखाई देगा।
जब भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने और 2047 में अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे करने
की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब ये श्रम संहिताएं एक समृद्ध, समावेशी और वैश्विक स्तर पर
प्रतिस्पर्धी राष्ट्र की आकांक्षाओं को साकार करती हैं।
लेखक: सुश्री वीनू जयचंद। वीनू EY में पार्टनर हैं और अफ्रीका, भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रदर्शन
सुधार और कौशल विकास के क्षेत्र में व्यापक विशेषज्ञता रखती हैं। वे समावेशी आर्थिक विकास को गति
देने में अग्रणी रही हैं।

