भोपाल 1 दिसंबर (आरएनएस)।डॉक्टरों ने कैंसर से जूझ रहे एक मरीज के जीवन में उम्मीद की रोशनी जगा दी। जिस मरीज की रीढ़ की हड्डी कैंसर की वजह से दबकर लगभग टूट गई थी और तेज दर्द के कारण वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहा था, उसी मरीज पर एम्स के डॉक्टरों ने एक आधुनिक तकनीक काइफोप्लास्टी का सफल ऑपरेशन किया। खास बात यह कि यह प्रक्रिया केवल 30 मिनट में पूरी हुई और मरीज ऑपरेशन के तुरंत बाद चलने-फिरने लगा। यह इलाज न केवल रीढ़ की मजबूती बढ़ाता है बल्कि कैंसर से कमजोर हो चुकी हड्डियों में दर्द को तेजी से कम करता है।
एम्स के डॉक्टरों ने बताया कि रीढ़ की हड्डी का टूटना या दब जाना आमतौर पर उम्र बढऩे या ऑस्टियोपोरोसिस से होता है, लेकिन जब यह समस्या कैंसर की वजह से होती है, तब स्थिति कई गुना गंभीर हो जाती है। कैंसर से रीढ़ की हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और जरा सा दबाव पडऩे पर भी हड्डी टूट या बैठ जाती है। इससे न केवल असहनीय दर्द होता है बल्कि कई बार मरीज का चलना फिरना भी असंभव हो जाता है।
डॉक्टरों के मुताबिक मरीज को कैंसर की वजह से वर्टेब्रल कम्प्रेशन फ्रैक्चर हो गया था। रीढ़ की एक हड्डी लगभग कुचल गई थी, जिससे मरीज बिस्तर पर ही सीमित हो गया था। दर्द इतना था कि वह करवट भी नहीं बदल पा रहा था। मॉर्फीन के इंजेक्शन लगने पर भी मरीज को दर्द से राहत नहीं मिल रही थी।
एम्स भोपाल के न्यूरोसर्जरी विभाग ने जांच में पाया कि हड्डी पूरी तरह बैठ चुकी है और पारंपरिक इलाज से राहत मिलना लगभग नामुमकिन है। ऐसे में डॉक्टरों ने काइफोप्लास्टी करने का निर्णय लिया। यह प्रक्रिया भारत के चुनिंदा मेडिकल सेंटर्स में ही उपलब्ध है।
काइफोप्लास्टी एक मिनिमली इनवेसिव प्रक्रिया है। जिसमें रीढ़ की टूटी या दब गई हड्डी में एक छोटी सुई से रास्ता बनाया जाता है। एक छोटा गुब्बारा अंदर डालकर फुलाया जाता है। इससे टूटी हड्डी अपनी सही ऊंचाई की ओर वापस उठती है। इस जगह को विशेष बोन सीमेंट से भर दिया जाता है। यह सीमेंट 10–15 मिनट में सेट होकर हड्डी को मजबूत बना देता है।
इससे हड्डी दोबारा दबती नहीं है, दर्द तुरंत कम हो जाता है और मरीज कुछ ही देर में चलने लगता है। एम्स भोपाल में भी इसकी प्रक्रिया से मरीज का इलाज किया गया। जिसमें सिर्फ 30 मिनट का समय लगा। डॉक्टरों के अनुसार सबसे बड़ी सफलता यह रही कि मरीज ऑपरेशन के तुरंत बाद खुद उठकर चलने लगा और दर्द लगभग 70-80त्न कम हो गया।
कैंसर मरीजों में हड्डियां बेहद कमजोर हो जाती हैं। रीढ़ की हड्डी पर हल्का सा दबाव भी बड़ा फ्रैक्चर बना सकता है। काइफोप्लास्टी इसलिए खास है क्योंकि यह ओपन सर्जरी नहीं है। खून ना के बराबर बहता है। मरीज जल्दी रिकवर होता है और दर्द तुरंत कम हो जाता है। हड्डी दोबारा बैठने की संभावना भी कम होती है
कई तरह के कैंसर जैसे ब्रेस्ट कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, लंग कैंसर जब शरीर में फैलते हैं, तो अक्सर हड्डियों को निशाना बनाते हैं। हड्डियों के अंदर मेटास्टेसिस होने से हड्डी खोखली और कमजोर हो जाती है। इसी कारण रीढ़ की वर्टेब्रल बोन थोड़े दबाव में भी टूट जाती है। उम्र, कीमोथेरेपी, रेडिएशन और कैल्शियम की कमी भी जोखिम बढ़ाते हैं। ऐसे मामलों में काइफोप्लास्टी मरीजों को तुरंत राहत दे सकती है।
काइफोप्लास्टी की विशेषताएं-95त्न मामलों में सफल
संक्रमण का खतरा बेहद कम
1 घंटे में मरीज सामान्य
अगले दिन घर जा सकता है
जिन मरीजों को अचानक पीठ में तेज, असहनीय दर्द हो, चलने में दिक्कत आए, झुककर चलना पड़े या एक्स-रे/एमआरआई में वर्टेब्रल फ्रैक्चर दिखे, उन्हें काइफोप्लास्टी से फायदा हो सकता है। खासकर कैंसर, ऑस्टियोपोरोसिस या उम्रदराज मरीजों में यह प्रक्रिया जीवन बदलने वाली साबित होती है। यह उपचार दर्द कम करके मरीज को फिर से सामान्य जीवन जीने लायक बनाता है।

