गोण्डा 11 दिसंबर। चित्रकूट की पावन धरती पर श्रीराम और भरत के मिलन की करुण गाथा जब शब्दों में ढली, तो उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। अखिल भारतीय श्रीराम नाम जागरण मंच के तत्वावधान में चल रही 11 दिवसीय श्रीराम कथा में बुधवार को कथावाचक रमेश भाई शुक्ल ने ऐसा शमां बांधा, मानो पूरा परिसर चित्रकूट की दिव्य वेला में परिवर्तित हो गया हो। कथा के दौरान भावनाओं का उफान ऐसा था कि अनेक श्रोताओं की आंखें नम पड़ गईं।
प्रवाचक ने श्रीरामचरित मानस की प्रसिद्ध चौपाई ‘झलका झलकत पायन्ह कैसे, पंकज कोस ओस कन जैसेÓ का संदर्भ देते हुए कहा कि यह केवल काव्य नहीं, बल्कि दो भाइयों के हृदयों में बसे प्रेम का दृश्यात्मक प्रतीक है। उन्होंने बताया कि श्रीराम अयोध्या से चलकर चित्रकूट तक पहुंचे, पर उनके चरणों में कहीं भी झलके (छाले) नहीं पड़े। इसके विपरीत भरत के चरण कठोर यात्राओं की गवाही देते हुए ऐसे झलक रहे थे, जैसे नवखिले कमलों पर ओस की चमकती बूंदें। प्रवाचक ने कहा कि यह दृश्य स्वयं दर्शाता है कि भरत का प्रेम, व्यथा और विरह कितना कठिन और गहन रहा होगा।
उन्होंने आगे बताया कि श्रीराम के वनगमन के समय वसंत ऋतु थी और वे लक्ष्मण व सीता के साथ श्रृंगवेरपुर तक रथ से गए थे, जबकि भरत को यह यात्रा लगभग एक माह बाद पैदल करनी पड़ी। अनेक मार्गों पर तपती धूप, कंटीली झाडिय़ां और कठिन भूभाग उनकी परीक्षा ले रहे थे। भाव-पल्लवन करते हुए प्रवाचक ने बताया कि भरत का प्रत्येक कदम जैसे यह पुकार रहा था कि उनका जीवन श्रीराम के चरणों के बिना अधूरा है।
लक्ष्मण द्वारा बोले गए शब्द ‘प्रगट करउं रिस पाछिल आजूÓ की गूढ़ व्याख्या करते हुए प्रवाचक ने बताया कि लक्ष्मण के मन में भरत के प्रति छिपा हुआ रोष किन परिस्थितियों का परिणाम था। कथा के चरम क्षण में उन्होंने वह दृश्य सुनाया जब भरत, श्रीराम की कुटिया देखते ही करुण स्वर में रोते हुए भूमि पर गिर पड़े। प्रवाचक बोले ‘यह वह क्षण था, जब प्रेम, भक्ति और विरह तीनों एक साथ फूट पड़े।Ó श्रीराम लपककर आए, भरत को उठाया और उन्हें गले से लगा लिया। इसका वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय पर्णकुटी के आसपास खड़े पशु-पक्षी, वनस्पतियां यहां तक कि पत्थर और चट्टानें भी भावविह्वल हो उठीं। यह मिलन केवल दो भाइयों का नहीं, बल्कि धर्म, प्रेम और आदर्शों का संगम था।
वनवास की अवधि तक राज्य संचालन के लिए भरत द्वारा किसी चिन्ह की मांग करने पर श्रीराम ने उन्हें अपनी चरण-पादुकाएं अर्पित कीं। प्रवाचक ने कहा कि यह केवल एक जोड़ी पादुकाएं नहीं थीं, बल्कि अयोध्या के शासन में त्याग, सेवा और निष्ठा की स्थापना थीं। भरत ने उन्हें सिंहासन पर स्थापित कर पूरे वनवास काल तक राजकाज संभाला और स्वयं कुटी में रहकर तपस्वी जीवन व्यतीत किया।
प्रवाचक ने कहा कि आज भी चित्रकूट के पावन कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा पथ पर वह स्थल मौजूद है, जहां यह अलौकिक मिलन हुआ था। यहां स्थापित राम, सीता, लक्ष्मण और भरत के विग्रह उस दिव्य क्षण की साक्षी बनकर आज भी श्रद्धालुओं को उस प्रेम और त्याग की याद दिलाते हैं।
कार्यक्रम में निर्मल शास्त्री, हरिओम पांडेय, राजीव रस्तोगी, अर्जुन सोनी, विवेक लोहिया, केएम शुक्ल, प्रभाशंकर, ईश्वर शरण, एसएन मिश्र, केके पांडेय, नितेश अग्रवाल, नंद किशोर सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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