मिल्कीपुर-अयोध्या 17 दिसंबर (आरएनएस)। मौसम में बदलाव तथा तापमान में गिरावट से इस समय आलू की फसल में पछेती, झुलसा रोग लगने की संभावना बनी हुई है आलू में पछेती झुलसा रोग फाईटोफ्थोरा इन्फेस्टनस नामक फंफूद से लगता है कृषि विश्वविद्यालय कुमारगंज के कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर मनोज मौर्य डा. सीएन राम ने बताया कि रोग का लक्षण सबसे पहले पत्तियों के सिरा व किनारे पर छोटे पानी से भरे धब्बे बनते है जो तेजी से फैलते है बाद में ये धब्बे गहरे भूरे से काले रंग के हो जाते है। इस रोग की विशेष पहचान पत्तियों के किनारे और चोटी का भाग भूरा होकर झुलस जाता है इस रोग का प्रभाव आलू की पतियों शाखाओं व कंदो पर भी देखने को मिलता है। जब वातावरण में नमी व आपेडिक आद्रता अधिक होती है, तब इस बीमारी का प्रकोप अधिक होता है। यह रोग एक सप्ताह के अंदर पौधों की हरी पत्तियों को झुलस कर नष्ट कर देता है, पत्तियों की निचली सतहों पर सफेद रंग के गोले बन जाते हैं, जो बाद में भूरे व काले हो जाते हैं जिन किसानों ने आलू की फसल में अभी तक फफूंदनाशक दवा का पर्णीय छिड़काव नहीं किया है या जिनकी आलू की फसल में अभी पछेती झुलसा की बीमारी प्रकट नहीं हुई है, वे मैन्कोजेब/प्रोपीनेब/क्लोरोथेलॉनील युक्त फफूंदनाशक दवा का रोग सुगाही किस्मों पर 0.2-0.25 प्रतिशत की दर से अर्थात् 2.0-2.5 किलोग्राम दवा 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव तुरन्त करेंसाथ ही साथ यह भी सलाह दी जाती है कि जिन खेतों में बीमारी प्रकट हो चुकी हो उनमें किसी भी फफूंदनाशक साईमोक्सेनिल मैन्कोजेब का 3.0 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर (1000 लीटर पानी) की दर से अथवा फेनॉमिडोन मैन्कोजेब का 3.0 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर (1000 लीटर पानी) की दर से अथवा डाईमेथोमार्फ मैन्कोजेब का 3.0 किग्रा. प्रति हैक्टेयर (1000 लीटर पानी) की दर से छिडकाव करेंफफूंदनाशक का छिड़काव 10 दिन के अन्तराल पर दोहराया जा सकता है। लेकिन बीमारी की तीव्रता के आधार पर इस अन्तराल को घटाया या बढ़ाया जा सकता है। किसान भाइयों को इस बात का भी ध्यान रखना होगा, कि एक ही फफूंदनाशक का बार-बार छिड़काव ना करें।
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