सिलीगुड़ी 19 दिसंबर (आरएनएस)। पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में युवा सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि, संघ को पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि ऐसा कोई अन्य संगठन नहीं है। वहीं उन्होंने कहा कि, आज जो लोग स्वयं को ‘हिन्दूÓ नहीं मानते, वे भी हिन्दू पूर्वजों के ही वंशज हैं। यह अलग बात है कि, पूजा-पद्धति और खान-पान अलग हो सकते हैं, किंतु हम एक राष्ट्र और एक संस्कृति के अंग हैं। जिसके हृदय में भारत-भक्ति नहीं है, वह हिन्दू नहीं हो सकता। सभी प्रकार की विविधताओं का सम्मान करने वाली विशिष्ट परंपरा ही हमारी ‘हिन्दू संस्कृतिÓ है। उन्होंने परिवार की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि हर परिवार को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि वह समाज की समृद्धि के लिए कितना समय, श्रम और संसाधन दे रहा है, क्योंकि समाज की मजबूती पर ही परिवार का अस्तित्व और सुरक्षा निर्भर करती है। डॉ. मोहन भागवत ने कहा- समाज में व्याप्त भेदभाव और संकीर्ण स्वार्थों को दूर करने के उद्देश्य से समाज-सुधार की धाराएं प्रारंभ हुईं। हम कौन हैं? हमारे अपने कौन हैं? आत्मबोध को पुन: जाग्रत करने के लिए दयानंद सरस्वती तथा रामकृष्ण-विवेकानंद की प्रेरणा से कार्य आरंभ हुआ। किशोर अवस्था में ही ‘डॉक्टर जीÓ ने नागपुर के विद्यालय में ‘वंदे मातरम्Ó आंदोलन का नेतृत्व किया। मोहन भागवत ने कहा- रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने निबंध ‘स्वदेशी समाजÓ में उदाहरण प्रस्तुत कर नेतृत्व देने तथा भीतर से नेतृत्व करने की क्षमता रखने वाले व्यक्तियों को ‘नायकÓ कहा है। आज जो लोग स्वयं को ‘हिन्दूÓ नहीं मानते, वे भी हिन्दू पूर्वजों के ही वंशज हैं। पूजा-पद्धति और खान-पान अलग हो सकते हैं, किंतु हम एक राष्ट्र और एक संस्कृति के अंग हैं। मोहन भागवत ने कहा- संविधान की संक्षिप्त प्रति घर में रखें और उसका अध्ययन करें। संघ में आइए, संघ को परखिए, और यदि सब उचित लगे तो संघ के कार्यों से जुडि़ए। आइए, हम सभी राष्ट्रोत्थान के इस महान अभियान में सहभागी बनें।
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