धनपतगंज/सुलतानपुर 6 जनवरी (आरएनएस )। पीरो सरैया गांव में सोमवार को जो हुआ, उसे अगर कम्बल वितरण कहा जाए तो कम्बल की भी बेइज्जती होगी। यहाँ गरीबों को ठंड से बचाने का नहीं, बल्कि नेताओं को कैमरों में चमकाने का कार्यक्रम था। मंच पर खड़े माननीय गण ऐसे मुस्कुरा रहे थे, जैसे ठंड इन्होंने ही पैदा की हो और अब वही महान दानी बनकर उसे खत्म करने आए हों। सामने बैठी बेचारी बुढिय़ा काँप रही थी लेकिन ठंड से कम, और इन एहसानों के बोझ से ज़्यादा। कम्बल हाथ में देते वक्त नेताओं के चेहरे पर जो गर्व था, मानो कोई महादान कर रहे हों। जैसे ये कम्बल नहीं, स्वर्ग की चाबी बाँट रहे हों। बुढिय़ा का हाथ थरथरा रहा था और कैमरा क्लिक-क्लिक कर रहा था। गरीबी यहाँ ज़रूरत नहीं, प्रॉप थी; मजबूरी यहाँ पृष्ठभूमि थी; और नेता मुख्य अभिनेता। यह सेवा नहीं, सेल्फी सेवा है। यह करुणा नहीं, कैमरा कृपा है। यह मदद नहीं, मार्केटिंग मॉडल है। कम्बल से पहले मंच, बुढिय़ा से पहले बैनर, और जरूरत से पहले न्यूज़ कवरेज। यही है इनकी प्राथमिकता। अगर सच में ठंड से राहत देनी होती तो चुपचाप दे देते। लेकिन नहीं यहाँ तो गरीब की पीठ पर हाथ नहीं, पोस्टर चिपकाया जाता है। बेचारी बुढिय़ा ठंड से नहीं मरेगी साहब, इनके एहसानों के बोझ तले दबकर मरेगी। क्योंकि ठंड तो मौसम की मार है लेकिन यह तमाशा3 यह व्यवस्था की मार है।
Login
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

