—- संवेदनहीन प्रशासन का चेहरा बेनकाब, न्याय के लिए अनशन से जूझ रही दिव्यांग महिला।
—- इच्छामृत्यु की गुहार भी बेअसर, दबंगों के आगे बेबस दिव्यांग महिला।
कुशीनगर, 08 जनवरी (आरएनएस)। महिला सम्मान, सुरक्षा और संवेदनशील शासन के खोखले दावों पर कुशीनगर जनपद के रामकोला थाना क्षेत्र के सिंगहा गांव की दिव्यांग महिला अल्पना तिवारी एक ऐसा जीता जागता सवाल बन गई है। जिसका जवाब सत्ता के किसी भी पास नहीं है। दिव्यांग अल्पना तिवारी चलफिर नही सकती है। वह कदम कदम पर सहारे की मोहताज है जो पिछले चार दिनों से खुले आसमान के नीचे भूखी-प्यासी अनशन पर बैठी है। यह कोई आंदोलन नहीं, बल्कि व्यवस्था के पत्थर दिल चेहरे पर मारी गई करुणा की सबसे तीखी चोट है।
बताते चलें कि दबंगों की दबंगई ने दिव्यांग अल्पना तिवारी की जीवन तबाह कर दिया है। उसने न्याय के लिए थाने से कलेक्ट्रेट तक, अफसरों से जन प्रतिनिधियों तक, मुख्यमंत्री से लेकर देश के राष्ट्रपति तक दरवाज़ा खटखटाया लेकिन हर जगह उसे सिर्फ खामोशी, टालमटोल और बेरुखी मिली। जब इंसाफ की उम्मीदें दम तोडऩे लगीं, तो उस दिव्यांग महिला ने जीने के अधिकार से ही हाथ खींच लेने का फैसला कर लिया और राष्ट्रपति से इच्छामृत्यु की गुहार लगा दी। यह उसकी कमजोरी कहे या फिर उसकी पीड़ा जहां उसकी जि़ंदगी खुद बोझ बन गयी है। शर्मनाक पहलू यह इच्छा मृत्यु की अर्जी भी प्रशासन की कुंभ कर्णी निद्रा को नहीं तोड़ सकी। न कोई जिम्मेदार उसकी पीडा सुनने उसके पास पहुंचा, न कोई संवेदना का ढाढस बढाया। चार दिनों से खुले आसमान के नीचे अनशन पर बैठी अल्पना का सूखता गला, कांपता शरीर और बुझती आंखें पूछ रही हैं क्या दिव्यांग होना इस सिस्टम में सबसे बड़ा अपराध है? कहना न होगा कि अल्पना तिवारी अपने जीवन को दांव पर लगाकर सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि हर उस बेबस महिला के लिए लड़ रही है। जिसे दबंग कुचल देते हैं और सिस्टम अनदेखा कर देता है। अगर समय रहते उसकी सुनवाई नहीं हुई और अनशन के दौरान उसकी जान को कुछ हुआ, तो यह सिर्फ एक हादसा नहीं होगा यह प्रशासनिक संवेदनहीनता से किया गया संगठित अन्याय माना जाएगा। अभी भी समय है। अल्पना तिवारी की करुण पुकार अनसुनी होती रही, तो यह साफ हो जाएगा कि महिला सम्मान सिर्फ मंचों की तालियों तक सीमित है, और ज़मीनी सच्चाई में इंसानियत को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया गया है।
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