नई दिल्ली,11 जनवरी। केंद्रीय बजट से पहले आयोजित प्री-बजट परामर्श बैठक को लेकर देश के कई राज्यों ने इसे बेहद सकारात्मक और उपयोगी बताया है. इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने की, जिसमें मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों और वित्त मंत्रियों ने हिस्सा लिया. बैठक का मकसद साफ था—आगामी बजट से पहले राज्यों की जरूरतों, समस्याओं और सुझावों को सीधे केंद्र सरकार तक पहुंचाना.
गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा कि उनकी सरकार ने राज्य से जुड़े खास मुद्दे बैठक में रखे. उन्होंने पिछले पांच सालों से चल रही केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं को आगे भी जारी रखने की मांग की. उनके मुताबिक, ये योजनाएं गोवा के विकास में अहम भूमिका निभा रही हैं और इन्हें रोकना राज्य के लिए नुकसानदायक होगा.
उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने बताया कि बैठक में सभी राज्यों से सुझाव मांगे गए. यूपी ने अपने प्रस्ताव इस सोच के साथ रखे कि राज्य को किस तरह ‘उत्तम प्रदेशÓ बनाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि हर राज्य की कोशिश यही है कि उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो और विकास की रफ्तार तेज हो.
तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने बैठक में कहा कि राज्यों को कई तरह की वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और सिंचाई जैसे अहम क्षेत्रों के लिए ज्यादा फंड की जरूरत पर जोर दिया. उनके मुताबिक, अगर इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ेगा तो इसका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा.
पश्चिम बंगाल की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने कहा कि उन्होंने केंद्र के सामने राज्य के लंबित बकाये का मुद्दा मजबूती से रखा. उन्होंने बताया कि करीब 1.97 लाख करोड़ रुपये अब भी बकाया हैं, जिन्हें जारी किया जाना जरूरी है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि राज्यों के साथ निष्पक्ष व्यवहार होना चाहिए.
झारखंड के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने कहा कि राज्य को सीमित संसाधनों के बावजूद कई केंद्रीय योजनाओं में ज्यादा खर्च उठाना पड़ता है. उन्होंने फंड मिलने में देरी की समस्या भी उठाई.
वहीं पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने बताया कि सीमा पर तनाव और हाल की बाढ़ से राज्य को भारी नुकसान हुआ है. उन्होंने कहा कि पहले घोषित राहत पैकेज अब तक नहीं मिला, जिसे लेकर बैठक में दोबारा मांग रखी गई.
प्री-बजट बैठक के बाद राज्यों के प्रतिनिधियों ने एक सुर में कहा कि बातचीत सकारात्मक रही और उन्हें उम्मीद है कि उनकी मांगों को आने वाले बजट में जगह मिलेगी. अब सबकी नजर इस बात पर है कि केंद्रीय बजट में राज्यों की इन आवाज़ों का कितना असर दिखता है.
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