नई दिल्ली,11 जनवरी। ईरान में महंगाई, बेरोजगारी और ईरानी मुद्रा में लगातार गिरावट के विरोध में शुरू हुए प्रदर्शन अब हिंसक रूप ले चुके हैं. बीते साल जून 2025 में इस क्षेत्र में इजऱाइल और अमेरिका के साथ टकराव के बाद यह दूसरी बार है जब ईरान गंभीर संकट में फंसा है. देशभर में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं और स्थिति राजनीतिक तथा आर्थिक दृष्टि से अनिश्चित हो गई है. यह संकट भारत के लिए भी गंभीर हो सकता है क्योंकि ईरान भारत के क्षेत्रीय और व्यापारिक हितों के लिए एक अहम स्थान रखता है.
ईरान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और व्यापारिक केंद्र है. भारत ने मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए कई परियोजनाओं में निवेश किया है, जिनमें ईरान एक अहम ट्रांजिट हब के रूप में काम करता है. विशेषकर ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह बंदरगाह पाकिस्तान को बायपास करते हुए भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधा मार्ग देता है. यदि ईरान में अशांति और अस्थिरता बढ़ती है तो चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) से माल की आवाजाही प्रभावित हो सकती है.
ईरान में मुद्रा संकट और खाद्य सब्सिडी वापस लिए जाने के कारण भारतीय बासमती निर्यातकों को भारी नुकसान हो रहा है. लगभग ?2,000 करोड़ का बासमती चावल अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर अटका हुआ है. ईरानी रियाल के भारी अवमूल्यन (1.5 लाख रियाल प्रति डॉलर तक) ने वहां आयात को अत्यधिक महंगा बना दिया है, जिससे पंजाब और हरियाणा के किसानों और मिल मालिकों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है.
वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 1.68 अरब डॉलर था. इसमें भारत का निर्यात लगभग 1.24 अरब डॉलर और आयात 0.44 अरब डॉलर था, जिससे भारत को करीब 0.80 अरब डॉलर का व्यापारिक लाभ हुआ.
भारत ईरान को मुख्य रूप से चावल, चाय, चीनी, दवाइयां, कृत्रिम फाइबर, विद्युत मशीनरी और आर्टिफिशियल ज्वेलरी निर्यात करता है. भारत अपने कुल बासमती निर्यात का लगभग 20त्न अकेले ईरान को भेजता है. वहीं, ईरान से भारत आने वाले प्रमुख उत्पादों में सूखे मेवे, अकार्बनिक और कार्बनिक रसायन, कांच के बर्तन और अन्य वस्तुएं शामिल हैं.
ईरान में चल रहे संकट और इंटरनेट ब्लैकआउट के कारण कार्गो हैंडलिंग और आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है. इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) के माध्यम से होने वाले व्यापार की लागत बढऩे और शिपमेंट में देरी होने का जोखिम है.
भारत के लिए अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाना कठिन हो गया है। हालांकि अमेरिका ने अप्रैल 2026 तक चाबहार बंदरगाह के लिए प्रतिबंधों में छूट दी है, लेकिन ईरान की आंतरिक अस्थिरता और इजरायल-ईरान तनाव भारत के रणनीतिक निवेशों के लिए अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं।
अगर ईरान में अशांति लंबी अवधि तक जारी रहती है, तो भारत के लिए व्यापारिक और रणनीतिक मार्गों में बाधा उत्पन्न हो सकती है. चाबहार बंदरगाह और आईएनएसटीसी पर माल की आवाजाही धीमी होने से भारत की अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रभावित हो सकती है. इससे भारत के निवेश और रणनीतिक परियोजनाओं पर भी असर पड़ सकता है.
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