—- सात साल सेवा देने वाले सुरक्षा कर्मियों को बाहर करने की साजिश।
कुशीनगर, 17 जनवरी (आरएनएस)। जनपद मुख्यालय रविन्द्रनगर धूस स्थित मेडिकल कालेज अपने दायित्व से भटकता हुआ दिख रहा है। जहां लोगो की जिन्दगी बचाना उद्देश्य है। वहीं गरीब कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी पर सुनियोजित हमला किया जा रहा है। चर्चा है कि मेडिकल कालेज में वर्ष 2019 से लगातार ड्यूटी निभा रहे तकरीबन एक दर्जन आउट सोर्सिंग सुरक्षा कर्मियों को हटाने की गहरी साजिश ने सिस्टम की संवेदनहीनता को नंगा कर दिया है।
आरोप है कि प्राचार्य मेडिकल कॉलेज के इशारे पर पुराने व अनुभवी कर्मचारियों को जबरन बाहर करने की तैयारी चल रही है, ताकि नई भर्ती के नाम पर खेल खेला जा सके। आरोप है कि जनवरी माह से कर्मचारियों के नाम हाजिरी रजिस्टर से जानबूझकर गायब कर दियि गया, जो सीधे-सीधे सेवा समाप्ति की भूमिका है।
इनसेट– कोरोना योद्धाओं के साथ विश्वासघात–बताया जाता है कि कोरोना काल में जब पूरा देश घरों में कैद था, तब यही सुरक्षा कर्मी जान जोखिम में डालकर अस्पताल की सुरक्षा में तैनात रहे। शासनादेश स्पष्ट हैं कि कोविड काल में सेवा देने वालों को संरक्षण और प्राथमिकता दी जाए, लेकिन कुशीनगर में उन आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें प्रतिदिन यह कहकर डराया जाता है कि “तुम लोग किसी काम के नहीं हो, कभी भी निकाल दिए जाओगे, वेतन भी नहीं मिलेगा।” यह रवैया केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र द्वारा गरीब परिवारों पर मानसिक उत्पीडऩ करने जैसा है।
इनसेट– शिकायतों पर प्रशासनिक चुप्पी– अपने हक के लिए जूझ रहे ये आउट सोर्सिंग कर्मचारी 14 अक्टूबर 2024 को पूर्व जिलाधिकारी को लिखित शिकायत दी थी। उससे पहले 29 मार्च 2023 को भी इन कर्मचारियों ने ज्ञापन सौंपा था लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं। सवाल यह है कि क्या आउट सोर्सिंग कर्मचारियों अधिकार सिर्फ कागज़ों तक सीमित हैं?
इनसेट– रोटी छीनने की साजिश– लगातार सात वर्षों की सेवा के बाद कर्मचारियों को बाहर करने की कोशिश केवल नौकरी का मामला नहीं, बल्कि यह उनके परिवारों को सड़क पर लाने की तैयारी है। यह घटना साबित करती है कि कैसे सरकारी संस्थानों में गरीब व छोटे कर्मचारियों को शिकार बनाया जा रहा है। अब कर्मचारियों ने जिलाधिकारी कुशीनगर से निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई और नौकरी की सुरक्षा की मांग की है। अब देखना यह है कि आम लोगो की पीडा को महसूस करने वाले संवेदनशील जिलाधिकारी इन कर्मचारियों के हित मे क्या कार्रवाई करते है।
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