ढाका ,06 फरवरी । भारत-अमेरिका ट्रेड डील के बाद बांग्लादेश में चिंता बढ़ गई है। ताजा घटनाक्रम में अमेरिका और बांग्लादेश के बीच 9 फरवरी को एक ट्रेड एग्रीमेंट साइन होने की संभावना है। इस डील की शर्तों को गोपनीय रखे जाने को लेकर बांग्लादेश में आलोचना हो रही है।
खास बात यह है कि बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव होने हैं और उससे ठीक पहले इस कथित सीक्रेट डील की चर्चा तेज हो गई है। भारत–अमेरिका ट्रेड एग्रीमेंट के बाद बांग्लादेश ने भी अमेरिका के साथ अपनी डील को जल्दबाजी में अंतिम रूप देने की कोशिश शुरू कर दी है। अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है।
बांग्लादेश को आशंका है कि यदि वह अमेरिका से समान या बेहतर शर्तें हासिल नहीं कर पाया, तो उसे भारत के मुकाबले अमेरिकी बाजार में नुकसान उठाना पड़ सकता है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक अमेरिका को रेडीमेड गारमेंट (आरएमजी) निर्यात पर निर्भर है, जो उसके कुल अमेरिकी निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत है।
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है, जब अप्रैल 2025 में अमेरिका ने बांग्लादेश पर 37 प्रतिशत का भारी टैरिफ लगाया था। इसके बाद जुलाई में बातचीत के जरिए इसे 35 प्रतिशत और अगस्त में घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया। प्रस्तावित ट्रेड डील के तहत टैरिफ को और कम कर 15 प्रतिशत किए जाने की उम्मीद जताई जा रही है।
इसी बीच, 2025 के मध्य में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अमेरिका के साथ एक औपचारिक नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत सभी टैरिफ और व्यापार वार्ताओं को गोपनीय रखने पर सहमति बनी थी। इस समझौते का कोई मसौदा न तो जनता, न संसद और न ही प्रमुख औद्योगिक हितधारकों के साथ साझा किया गया।
बताया जा रहा है कि प्रस्तावित डील में कई शर्तें शामिल हैं। इनमें चीन से आयात कम करना और उसके बजाय अमेरिका से सैन्य आयात बढ़ाना शामिल है। इसके अलावा, अमेरिकी उत्पादों को बांग्लादेश में बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश देने और अमेरिकी मानकों व सर्टिफिकेशन को बिना सवाल स्वीकार करने की शर्त भी रखी गई है।
अमेरिकी वाहनों और उनके पुर्जों के आयात पर किसी प्रकार का निरीक्षण न किए जाने की मांग भी की गई है, ताकि अमेरिकी गाडिय़ों को बांग्लादेशी बाजार में आसानी से प्रवेश मिल सके।
प्राइवेट रिसर्च संगठन सेंटर फॉर पॉलिसी डायलॉग (सीपीडी) के फेलो देवप्रिया भट्टाचार्य ने प्रोथोम आलो से बातचीत में कहा कि यह ट्रेड डील पारदर्शी नहीं है, क्योंकि इसके संभावित फायदे और नुकसान पर चर्चा का कोई अवसर नहीं दिया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि एक गैर-चुनी हुई अंतरिम सरकार द्वारा चुनाव से ठीक तीन दिन पहले इस तरह का समझौता करना चिंता का विषय है। ऐसे में इस डील को लागू करने की जिम्मेदारी उस नई सरकार पर आएगी, जो चुनाव के बाद सत्ता में आएगी।
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