लखनऊ,07 फरवरी (आरएनएस)। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि भाजपा हमेशा से एक सुनियोजित रणनीति के तहत किसी समाज के कुछ लोगों का दुरुपयोग उसी समाज के खिलाफ करती रही है। उन्होंने कहा कि भाजपा किसी समाज विशेष को चिन्हित कर उसे टारगेट करती है और फिर बयानबाज़ी, नोटिस, विज्ञापन, प्रचार सामग्री या फिल्मों के माध्यम से उस समाज को अपमानित और आरोपित करने का काम करती है।अखिलेश यादव ने कहा कि जब भाजपा द्वारा रचे गए विवाद बढ़ जाते हैं और जनआक्रोश सामने आता है, तब वह गिरगिट की तरह रंग बदलती है। घडिय़ाली आंसू बहाए जाते हैं और दिखावे के लिए झूठी कार्रवाई का नाटक किया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि भाजपा अंदर ही अंदर टारगेट किए गए समाज को अपमानित और उत्पीडि़त होते देखकर खुश होती है।उन्होंने कहा कि वर्तमान में जो फिल्मी मुद्दा चर्चा में है, उसका नाम लेना भी संभव नहीं है, क्योंकि उस फिल्म का शीर्षक न केवल आपत्तिजनक बल्कि अत्यंत अपमानजनक है। उस नाम को दोहराना भी भाजपा के उस समाज के तिरस्कार के उद्देश्य को ही पूरा करेगा। अखिलेश यादव ने स्पष्ट कहा कि ऐसी फिल्म नाम बदलकर भी रिलीज नहीं होनी चाहिए। जब तक निर्माताओं को आर्थिक नुकसान नहीं होगा, तब तक इस तरह की फिल्में बनती रहेंगी, क्योंकि पैसे के लालच में भाजपा का एजेंडा चलाने वाले लोग किसी और के नहीं होते।उन्होंने कहा कि यह रचनात्मक स्वतंत्रता या क्रिएटिव लिबर्टी का सवाल नहीं है, बल्कि यह रचनात्मक समझ और जिम्मेदारी का विषय है। पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर बनाई गई ऐसी फिल्म, जो एक सोची-समझी साजिश के तहत किसी एक पक्ष या समाज की भावनाओं को आहत करे, उसे मनोरंजन कैसे कहा जा सकता है। यदि उद्देश्य मनोरंजन नहीं है, तो फिर यह स्पष्ट हो जाता है कि इसके पीछे किसी समाज को बदनाम करने का एजेंडा है, जिसकी पूरी सच्चाई जनता के सामने आनी चाहिए।अखिलेश यादव ने मांग की कि यह भी उजागर होना चाहिए कि इस तरह की फिल्मों के पीछे कौन लोग हैं और कौन अपना पैसा व दिमाग सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाने वाले विध्वंसकारी कार्यों में लगा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर रचनात्मक स्वतंत्रता जानबूझकर किसी के मान-सम्मान और गरिमा का हनन करती है, तो ऐसी दुराग्रही रचनात्मकता पर रोक लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं हो सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक स्वीकार्य है, जहां तक वह किसी अन्य की प्रतिष्ठा और सम्मान को ठेस न पहुंचाए।अखिलेश यादव ने कहा कि सिनेमा को समाज का दर्पण माना जाता है, लेकिन यह दर्पण मैला और मलिन नहीं होना चाहिए। समाज में नफरत, भेदभाव और अपमान फैलाने वाला सिनेमा न तो कला है और न ही मनोरंजन, बल्कि वह सामाजिक ताने-बाने को तोडऩे का माध्यम बन जाता है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

