सत्ता पक्ष के मुताबिक चूंकि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए उसमें वर्णित मामलों का उल्लेख सदन में नहीं हो सकता। मगर किताब का प्रकाशन किसने रोक रखा है? बेहतर होगा कि प्रकाशन की मंजूरी अविलंब दी जाए।
पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरावणे की किताब लगभग 21 महीनों से प्रकाशन के इंतजार में है, क्योंकि उसे केंद्र से हरी झंडी नहीं मिली है। अब उस किताब में वर्णित बातों को लेकर एक अंग्रेजी पत्रिका ने लंबी रिपोर्ट छापी है। उसमें शामिल एक प्रकरण का हवाला विपक्ष के नेता राहुल गांधी लोकसभा में देना चाहते थे। मगर सत्ता पक्ष की आपत्तियों के बीच स्पीकर ने इसकी इजाजत नहीं दी। बहरहाल, कांग्रेस ने उस पूरी रिपोर्ट को अपने सोशल मीडिया हैंडल्स पर डाल कर उसे जनमत के बड़े हिस्से तक पहुंचा दिया है। इसके मुताबिक अगस्त 2020 में रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण कैलाश रेंज की चोटी पर भारतीय फौज के नियंत्रण के बाद चीन ने हमला करने की तैयारी की थी। जब टैंकों समेत चीनी सेना की टुकडिय़ां आगे बढ़ रही थीं, तब तत्कालीन सेनाध्यक्ष नरावणे ने बार-बार रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, और विदेश मंत्री को फोन कर जवाबी कार्रवाई के लिए निर्देश मांगे।
मगर इस पर घंटों तक टाल-मटोल की गई। आखिरकार प्रधानमंत्री से चर्चा के बाद राजनाथ सिंह ने उन्हें निर्देश दिया- जो उचित लगे, वह करें। स्पष्टत: ये प्रकरण वर्तमान सरकार की नेतृत्व क्षमता एवं संकल्प शक्ति को कठघरे में खड़ा करता है। सेना युद्ध संबंधी फौरी (टैक्टिल) फैसले ले सकती है, लेकिन ऑपरेशनल एवं रणनीतिक निर्णय लेने की स्थिति में सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व होता है। रिपोर्ट के मुताबिक जनरल नरावणे के सामने कई कठिन प्रश्न थे। कोरोना के कारण देश अस्त-व्यस्त था, जिससे मोर्चों पर सहज सप्लाई को लेकर आशंकाएं थीं। फिर युद्ध फैलता, तो विदेश नीति एवं कूटनीति संबंधी उसके परिणामों का आकलन सरकार ही कर सकती थी। मगर उस कठिन घड़ी में केंद्र ने जिम्मेदारी सेनाध्यक्ष पर टाल दी। सत्ता पक्ष का कहना है कि चूंकि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए उसमें वर्णित मामलों का उल्लेख सदन में नहीं हो सकता। मगर प्रश्न है कि किताब का प्रकाशन किसने रोक रखा है? सरकार के पास कुछ ढकने को नहीं है, तो बेहतर होगा कि वह तुरंत किताब प्रकाशन की मंजूरी दे, ताकि देश तत्कालीन सेनाध्यक्ष के अनुभव उनके ही शब्दों में जान सके।
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