नई दिल्ली 17 Feb, (Rns): भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कामकाज और याचिकाएं तैयार करने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते और लापरवाह इस्तेमाल पर गहरी चिंता व्यक्त की है। हाल के दिनों में अदालत के सामने ऐसे कई चौंकाने वाले मामले आए हैं, जिनमें वकीलों ने एआई टूल की मदद से याचिकाएं तैयार कीं और उसमें ऐसे फैसलों और उद्धरणों का हवाला दे दिया, जिनका असल में कोई वजूद ही नहीं है। इस तरह की फर्जी और भ्रामक जानकारी पेश किए जाने पर शीर्ष अदालत ने सख्त ऐतराज जताया है।
हिमंता बिस्वा मामले में बेंच ने जताई सख्त नाराजगी
यह गंभीर टिप्पणी चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की पीठ ने हिमंता बिस्वा मामले की सुनवाई के दौरान की। सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि कुछ वकील बिना किसी तथ्य की जांच या क्रॉस-वेरिफिकेशन किए आंख मूंदकर एआई टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसकी वजह से अदालत में गलत और भ्रामक जानकारी पेश की जा रही है, जो न्याय प्रक्रिया के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकती है।
जब अदालत में पेश हुआ ‘दया बनाम मानवता’ का मनगढ़ंत केस
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने एक ऐसा उदाहरण दिया जिसने सभी को हैरान कर दिया। उन्होंने बताया कि अदालत के समक्ष ‘दया बनाम मानवता’ नाम से एक ऐसे फैसले का हवाला दिया गया, जो पूरी तरह से काल्पनिक था और कानूनी इतिहास में इसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि कई बार वकील वास्तविक मामलों का हवाला तो देते हैं, लेकिन उनके जो अंश या पैराग्राफ अदालत में पेश किए जाते हैं, वे मूल फैसले में कहीं लिखे ही नहीं होते हैं। सीजेआई ने बताया कि बिल्कुल ऐसा ही एक वाकया न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अदालत में भी सामने आ चुका है, जहां पेश किए गए पूर्व उदाहरण पूरी तरह से मनगढ़ंत और फर्जी पाए गए थे।
एआई समिट के बीच चेतावनी, जल्द जारी होंगे प्रशासनिक निर्देश
सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी ऐसे अहम समय में आई है जब देश में एक अंतरराष्ट्रीय एआई समिट का आयोजन हो रहा है। इस मौके पर शीर्ष अदालत ने एआई के दुरुपयोग को लेकर पूरे कानूनी जगत को सचेत किया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह न्यायपालिका में एआई के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए जल्द ही सभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को विस्तृत प्रशासनिक निर्देश जारी करेगा। अदालत ने वकीलों को सख्त हिदायत दी है कि तकनीक कानूनी रिसर्च में केवल एक मददगार हो सकती है, लेकिन अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों की प्रामाणिकता की अंतिम जिम्मेदारी पूरी तरह से वकील की ही होगी।

