उत्तर कोरिया 26 Feb, 2026 – उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने एक बार फिर दक्षिण कोरिया को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि यदि उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा को किसी भी प्रकार का खतरा हुआ, तो परमाणु-संपन्न उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया को “पूरी तरह से मिटा” सकता है। साथ ही उन्होंने सियोल के साथ किसी भी प्रकार की वार्ता से इनकार दोहराया।
सरकारी मीडिया के मुताबिक, सत्तारूढ़ पार्टी की एक अहम बैठक के समापन पर किम ने अगले पांच वर्षों के लिए नीतिगत प्राथमिकताओं की रूपरेखा पेश की। हालांकि, उन्होंने अमेरिका के साथ संभावित बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए और संकेत दिया कि परिस्थितियां अनुकूल होने पर संवाद संभव है।
दक्षिण कोरिया के खिलाफ और तीखी बयानबाजी
हाल के वर्षों में किम ने दक्षिण कोरिया के प्रति अपने तेवर और कड़े किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयानबाजी तत्काल सैन्य संघर्ष का संकेत नहीं देती, बल्कि एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है। इसके तहत उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम और मॉस्को व बीजिंग के साथ बढ़ते संबंधों के सहारे खुद को अधिक प्रभावशाली ताकत के रूप में स्थापित करना चाहता है। आधिकारिक समाचार एजेंसी Korean Central News Agency ने बताया कि किम ने सेना की परमाणु क्षमता को और मजबूत करने के लिए नई हथियार प्रणालियों के विकास पर जोर दिया है। उनका कहना है कि हाल के वर्षों में मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम में तेज प्रगति ने देश को एक स्थापित परमाणु शक्ति के रूप में खड़ा कर दिया है।
अमेरिका से बातचीत पर शर्त
किम ने स्पष्ट किया कि यदि संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से ठप पड़ी वार्ता को फिर से शुरू करना चाहता है, तो उसे उत्तर कोरिया के प्रति अपनी कथित “शत्रुतापूर्ण नीतियां” छोड़नी होंगी। गौरतलब है कि 2019 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ वार्ता विफल होने के बाद से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद ठप पड़ा है।
दक्षिण कोरिया की प्रतिक्रिया
दक्षिण कोरिया के एकीकरण मंत्रालय ने उत्तर कोरिया के रुख को “खेदजनक” बताया है। मंत्रालय ने कहा कि सियोल शांति और स्थिरता के प्रयासों को धैर्यपूर्वक जारी रखेगा, भले ही प्योंगयांग अंतर-कोरियाई संबंधों को शत्रुतापूर्ण रूप में परिभाषित कर रहा हो। विशेषज्ञों का मानना है कि किम का सख्त रुख आने वाले समय में कोरियाई प्रायद्वीप की राजनीति को और जटिल बना सकता है, हालांकि फिलहाल इसे रणनीतिक दबाव की नीति के तौर पर देखा जा रहा है।

